चित्त[1] का परिघटनाशास्त्र[2] (भूमिका: संज्ञान पर – पैराग्राफ 1-72)
अनुवादक आर श्रीवत्सन[3] , अदिति मुखर्जी[4] (2026)
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किसी भी लेख/कृति को शुरू करने से पहले, यह दस्तूर है कि लेखक भूमिका में अपना उद्देश्य और इसे लिखने का कारण स्पष्ट करे। यह भी बताए कि इसी मुद्दे पर भूतपूर्व और समकालीन कृतियों के दृष्टिकोण के साथ इस कृति का क्या संबंध है। मगर, किसी दार्शनिक कृति में ऐसा स्पष्टीकरण अनावश्यक ही नहीं, पर, मूल विषय के प्रकृति के अनुसार यह अनुचित और भ्रामक भी हो सकता है। क्योंकि दार्शनिक रचना की भूमिका में जिस तरह के वक्तव्य नियमानुसार प्रस्तुत किए जाते हैं (जैसे, उसकी दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली का ऐतिहासिक विवरण, उसका व्यापक विषयवस्तु और निष्कर्ष; सच्चाई के बारे में बहुत सारे असंबद्ध दावे करना और आश्वासन देना)[5] वे एक दार्शनिक सत्य की व्याख्या करने के ग्राह्य तरीके नहीं हो सकते हैं। इसके अलावा, फ़लसफ़े (दर्शन) की व्याप्ति सारतः सार्वभौमिक है, जो विशिष्टता को अपने अंदर शामिल करता है। और इस से यह धारणा बनती है (अन्य विज्ञानों से ज्यादा, फ़लसफ़े में) कि मूल विषय के अहम पहलू केवल उद्देश्य और निष्कर्ष के जरिए व्यक्त किए जाते हैं, जब कि विवरण दर असल ग़ैर-ज़रूरी है। इसके विपरीत, हमें यकीन कराने की जरूरत नहीं है कि, मसलन, शरीर-रचना-विज्ञान की आम समझ (जैसे, निर्जीव अवस्था में शरीर के विभिन्न अंगों का ज्ञान) से हम मूल विषय को नहीं छू पाते है। इसके साथ साथ हमें [जीवित अवस्था में] इन अंगों की भूमिका को भी समझने की ज़रूरत है। और, ऐसे तथ्य-समूहन (जिसे शास्त्र का नाम नहीं दिया जा सकता है) जिसमें उद्देश्य और ऐसी साधारण बातों का मामूली विवरण दिया जाता है, वह सूचीकरण और गैर-वैचारिक तरीके से की गई विषयवस्तु (ये तंत्रिकाएं, मांसपेशियाँ इत्यादि) की चर्चा से अलग नहीं है। इसके विपरीत दर्शनशास्त्र में एक असामंजस्य पैदा होता है – दर्शनशास्त्र ही दिखाता है कि दर्शनशास्त्र में अपनाया गया यह तरीका सत्य को पकड़ नहीं पाता है।
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इसी तरह, किसी दार्शनिक कृति का (उसी विषय पर लिखे गए) अन्य प्रयासों के साथ संपर्क स्थापन एक बाहरी मुद्दा उत्पन्न करता है और सत्य की समझ के लिए ज़रूरी तत्व को धुंधला देता है। आम धारणा में सही और गलत का विरोध दृढ़ बद्ध होता है, और ऐसी धारणा मौजूदा दार्शनिक सिद्धांतों के प्रति सहमति या असहमति की अपेक्षा करती है; और इस लिए इन सिद्धांतों पर किसी भी टिप्पणी में या तो सहमति देखती है, या असहमति। आम धारणा में यह समझ नहीं होती है कि दर्शन के विविध सिद्धांत सत्य के क्रमिक विकास के अंग हैं; बल्कि विविधता में केवल असहमति ही दिखती है। जब फूल खिल उठता है, कली लुप्त हो जाती है, और ऐसा कहा जा सकता है कि फूल कली को झुठला देता है। इसी तरह जब फल लगता है, ऐसा ऐलान किया जाता है कि फूल पौधे का झूठा प्रकटीकरण है और फल को, फूल की जगह, पौधे की सच्चाई माना जाता है। इनके स्वरूप केवल अलग ही नहीं होते हैं बल्कि परस्पर-विरोधी होने के नाते एक दूसरे की जगह ले लेते हैं। ऐसा होने के बावजूद इनका प्रवाही स्वभाव इनको एक [उद्देश्यपूर्ण] जैविक इकाई का अंग बना देता है, जिसमें ये परस्पर-विरोधी नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक अंग हर दूसरे अंग के समान आवश्यक है; और यह साझा आवश्यकता ही इनके जैविक संपूर्णता का गठन करता है। लेकिन किसी भी दार्शनिक सिद्धांत के खिलाफ विरोधाभास में अकसर यह आत्म ज्ञान [अपना भी इस जैविक संपूर्णता का अंग होने का] नहीं होता है। न ही विश्लेषणात्मक चेतना साधारणतः यह जानती है कि इस विरोधाभास को कैसे इसके एकपक्षीयता से मुक्त किया जाए; और न ही प्रतीयमान विरोध और वैपरित्य में पारस्परिक आवश्यक अंगों को पहचान पाती है।
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इस तरह के मांग और उनकी पूर्ति आसानी से यह गलतफहमी पैदा कर सकते हैं कि यह मूल विषय से संबन्धित हैं। आखिर, किसी दार्शनिक कृति के मूल तत्व की पूर्ण अभिव्यक्ति उसके उद्देश्य और निष्कर्ष के अलावा और कहाँ पाई जाए! और इस विषय पर लिखे गए समसामयिक कृतियों से तुलना किए बिना अपने उद्देश्य और निष्कर्ष की भिन्नता को स्पष्ट रूप से कैसे ही बताया जाए? लेकिन जब इस प्रक्रिया को संज्ञान की केवल शुरुआत नहीं, बल्कि इसी को संज्ञान मान लिया जाए, तब हमें इस प्रक्रिया को असली मुद्दे को टालने का एक तरीका समझ लेना चाहिए। और यह भी समझना चाहिए कि इस तरीके का मूल विषय पर गहराई से जूझने का भ्रम असल में दोनों [मूल विषय और उस से जूझना] से बच निकलता है। वैसे, असली विषय की परिपूर्णता उसके लक्ष्य से नहीं, बल्कि उसके विस्तृत विवरण में होता है; इसी तरह उसका असली स्वरूप केवल निष्कर्ष में नहीं, बल्कि उस निष्कर्ष के बनने की प्रक्रिया में होता है। लक्ष्य अपने आप में एक निर्जीव अमूर्त धारणा है, जब कि यथार्थता[6] के बिना पथ में भटकाव ही है; और नग्न निष्कर्ष एक लाश ही है जो उद्देश्यपूर्ण पथ से भटक गया हो। इसी तरह, भिन्नता विषय की सीमा पर या उसके लुप्त होने पर ही होता है; या भिन्नता वह है जो विषय नहीं है। इस लिए, लक्ष्य या निष्कर्ष पर मेहनत करना, और एक [कृति और] दूसरे की नाप तोल करना और उनके बीच भिन्नता दिखाना, शायद जितना मुश्किल लगता है, उतना नहीं है। क्योंकि विषय के साथ जूझने के बजाय ऐसी प्रक्रिया हमेशा उसके बाहर ही चली जाती है; विषय में ठहरकर उसमें अपने आप को खोने के बजाय, इस तरह का ज्ञान और किसी चीज के लिए लालायित होता है; विषय के प्रति आत्म समर्पित होकर उसमें समा जाने के बजाय, ऐसा ज्ञान अपने आप में लीन रहता है। किसी भी ठोस कृति के प्रति अपनी राय देना बहुत आसान होता है; उसे समझना इससे मुश्किल है; इन दोनों को मिला कर एक सुनियोजित विवरण पर पहुंचना सबसे ज़्यादा मुश्किल होता है।
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संस्कृति और [चित्त का] अमध्यस्थ वस्तुगत जीवन से उभरना हमेशा निम्नलिखित तरीके से होता है। हम सर्वव्यापी सिद्धांतों और विभिन्न दृष्टिकोण से परिचित होते हैं। सब से पहले हम असली मुद्दे के बारे में एक साधारण सोच की ओर बढ़ते हैं। साथ ही साथ हम तर्क के द्वारा उस विषय के पक्ष या विपक्ष में एक निर्णय लेना सीखते हैं। हम विषय के समृद्ध और ठोस विपुलता को निश्चित रूप से समझना सीखते हैं, और उसका सही विवरण और उसके बारे में सुचिन्तित निर्णय दे सकते हैं। लेकिन सबसे पहले संस्कृति के विकास की यह शुरुआत ज़िंदगी की व्यापक गंभीरता के लिए जगह बनाती है जो हमें मूल विषय के अनुभूति तक ले जाती है। और अगर इन सब से उभर कर अवधारणा की गंभीरता विषय के गहराई तक उतरती है, तब भी इस तरह के [भाववाचक, सतही] सूचना और अनुमान, चर्चा में अपने सही जगह पर कायम रहेंगे।
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सत्य का सही रूप केवल सत्य की वैज्ञानिक [तार्किक] पद्धति में ही होता है। फ़लसफ़े को वैज्ञानिक संरचना के करीब लाने का प्रयास – यानी कि ‘ज्ञान से प्रेम’ [फ़िलो सोफ़ीया] का नाम छोड़ कर असली ज्ञान बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ना – यही मैं करने चला हूँ। ज्ञान की प्रकृति में विज्ञान बनना उसकी अंदरूनी ज़रूरत है, और इस बात की एकमात्र संतोषजनक व्याख्या फ़लसफ़े का प्रस्तुतीकरण ही है। लेकिन बाहरी ज़रूरत, जहां तक सार्विक रूप से सोचा जाए (व्यक्ति और व्यक्तिगत इरादों जैसे विशेषताओं को छोड़कर), अंदरूनी ज़रूरत से अभिन्न है, अर्थात, यह उसका प्रकटीकरण है, जिसमें समय उसके पहलुओं की उपस्थिति को प्रस्तुत करता है। यह बताना कि फ़लसफ़े को विज्ञान के दर्ज़े तक पहुंचाने का सही वक्त आ गया है – यही इस लक्ष्य के प्रति विभिन्न प्रयास का एक मात्र सही औचित्य है, क्योंकि यह इस लक्ष्य की ज़रूरत [अनिवार्यता] को दर्शाएगा, और साथ ही साथ इस लक्ष्य को कार्यान्वित करेगा।
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जब सत्य का सही आकार ऐसे वैज्ञानिक शैली में उपस्थापित किया जाता है – यानी कि यह दावा करना कि सत्य के [सजीव] अस्तित्व का मूल-तत्व अवधारणा में ही है – मुझे अच्छी तरह मालूम है कि यह दावा ऐसे विचार और उनके परिणाम जो हमारे ज़माने के सोच में अक्खड़ और व्यापक रूप से प्रचलित हैं, उनके खिलाफ है। इसी लिए इस विरोधाभास की व्याख्या किसी भी सूरत में अनावश्यक नहीं है, हालांकि यहाँ यह [व्याख्या] एक दावे से अधिक नहीं हो सकता है, ठीक इसी तरह जैसे विपरीत पक्ष भी दावा ही है। विपरीत पक्ष के दावे के अनुसार सत्य उसी में है, या वही है, जो अलग अलग नाम से जाना जाता है, जैसे – अंतर्ज्ञान, परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान, धर्म, *होना—*दैविक प्रेम के केंद्र में होना नहीं, बल्कि इस केन्द्र का ही होना। अगर यह सच है तो फ़लसफ़े के प्रस्तुतीकरण के लिए अवधारणा की संरचना नहीं बल्कि उसके विपरीत की ज़रूरत है: परम तत्व को बूझना नहीं, बल्कि सहज ज्ञान से उसको महसूस करना; परम तत्व की अवधारणा और उसकी अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उसका अनुभव और सहज ज्ञान होना।
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अगर हम ऐसे मांग के आविर्भाव को व्यापक प्रसंग में देखें, और इस समय आत्म-चेतन चित्त किस स्तर पर है, उस पर गौर करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि चित्त, जो पहले विचार क्षेत्र में वस्तुगत जीवन बिताता था, अब उस से उभर के आया है, -- उसके विश्वास के अमध्यस्थता[7] के परे; चित्त के सत्य के साथ एकात्म होने से उत्पन्न संतुष्टि और सुरक्षितता के परे; और सत्य का सर्वव्यापी विद्यमान (भीतर और बाहर) होने के परे। चित्त न ही इन सब को पार कर के विपरीत दिशा में वापस अपने भीतर निरर्थक [निष्फल] चिंतन में खो गया है, बल्कि उससे भी आगे निकल गया है। चित्त ने अपने मौलिक जीवन को सिर्फ खोया ही नहीं है, बल्कि उसे इस खोने का और अपने सीमाबद्धता का ज्ञान है। खोखलेपन से हटकर, और अपनी दुरवस्था को मानते और कोसते हुए, यह अब फ़लसफ़े से आत्मज्ञान नहीं मांगता है, बल्कि यह मांग करता है कि फ़लसफ़ा फिर से उसके पहले जैसी ठोस और स्थिर अवस्था को स्थापित करने में मदद करे। फ़लसफ़े को इस मांग को पूरी करने के लिए, ऐसा नहीं कि वह जड़-तत्व के बंद ताले को खोल कर उसे आत्म-चेतना के स्तर पर ले आए, और न ही भटकती चेतना को व्यवस्थित विचार और अवधारणा की सहजता की तरफ ले आए, बल्कि वह विश्लेषणात्मक अवधारणा को दबा कर विचार की विशिष्टता को धुंधला दे, और अंतर्दृष्टि[8] नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उपदेश से सत्य के एहसास को स्थापित करे। और इसे [उपदेश को] निगलने के लिए सौन्दर्य, पावन, अनंत, धर्म, और प्रेम जैसे चारे का प्रलोभन ज़रूरी होता है; अवधारणा नहीं बल्कि हर्षोन्माद, विषय की अनिवार्यता का ठंडे दिमाग से विश्लेषण नहीं, बल्कि जोश का उफान; ऐसा माना जाता है कि यही हैं जो सत्व के ‘धन’ को बनाए रखते हैं और बढ़ावा भी देते हैं।
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इस मांग के साथ-साथ लोगों को ऐंद्रिक, साधारण और विशिष्ट चीजों में लीन रहने से हटाकर उनकी नज़र तारों की तरफ ले जाने की जोरदार, सरगर्म और (सतही तौर से) उग्र कोशिश जारी है; जैसे कि वे आध्यात्मिकता को भूल चुके हैं और कीड़े-मकोड़ों की तरह गंदे नाली में संतुष्ट रहने को तैयार हैं। पहले उनके पास विचारों और मूर्तियों से समृद्ध एक स्वर्ग था। अस्तित्व का अर्थ उस रोशनी के धागे में निहित था, जो उसे स्वर्ग के साथ जोड़ रखा था; वर्तमान में ठहरे रहने के बजाय हमारी नज़र वर्तमान के परे, इस धागे से तिरते हुए, दैविक सत्व यानी कि परलोक की ओर जाता था। चित्त की दृष्टि को जबरन लौकिक विषयों की तरफ लाना और ठहराना था; अलौकिक विषयों के बारे में जो स्पष्टता थी, उस स्पष्टता को लौकिक एहसास, जो धुंध और विभ्रांति से घिरा हुआ था, उसमें लाना; और वर्तमान पर केंद्रित ध्यान को (जो अनुभव कहलाया जाता था) रोचक और वैध बनाना – यह सब करने के लिए बहुत समय और कड़ी मेहनत लगी। -- अब लगता है कि हमें इसके विपरीत की ज़रूरत है: जैसे कि चेतना इस दुनिया में इतना ज़बरदस्त जमा हुआ है कि उसे उखाड़ने के लिए उतनी ही शक्ति की आवश्यकता है। ज़ाहिर है कि चित्त इतना कंगाल हो गया है, (जैसे रेगिस्तान में भटकता हुआ आदमी एक घूँट पानी के लिए तरसता है), कि वह पुनर्जीवित होने के लिए, आध्यात्मिकता के आभास मात्र के लिए तरसता है। चित्त की दुर्गति का हद, जिस [रत्ती भर प्राप्ति] से वह तृप्त होता है, उसी से नापा जा सकता है।
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लेकिन [चित्त की] शास्त्र के लिए यह संगत नहीं है कि इस तुच्छ मांग को कंजूसी से पूरी की जाए, या उसके स्वीकरण में रत्ती भर संतुष्टि हो। जो सिर्फ उपदेश की खोज में है, और जो भी इस अनिश्चित दिव्यता में अनिश्चित सुख पाने के लिए उसके सुनिश्चित अस्तित्व और सोच की लौकिक विविधता को धुँधलाना चाहता है, वह जहाँ चाहे इसे ढूंढ सकता है। उसे अपने जोश को ज़ाहिर करने के लिए आसानी से कोई उपाय मिलेगा, और वह उससे गर्वित होगा। लेकिन फलसफा को उपदेश देने की चाहत से सतर्क रहना होगा।
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शास्त्र को अस्वीकार करने वाली ऐसी आत्म-संतुष्टि को और भी कम यह दावा करना चाहिए कि ऐसा अस्पष्ट जोश शास्त्र से कहीं बेहतर है। ऐसा पैगम्बरी कथन मानता है कि वह एक दम केंद्र और गहराइयों में बसता है—वह निर्धारितता/निश्चितता (the Horos) को अवज्ञा से देखता है, अवधारणा और तर्क के नियंत्रण से जानबूझकर दूर रहता है; जो विचार केवल [लौकिक] परिमितता में बसता है, उससे वह [यह पैगम्बरी कथन] दूर रहता है। लेकिन जैसे एक खोखला फैलाव होता है, वैसे ही एक खोखली गहराई होती है; और ठीक जैसे जड़-तत्व का विस्तार, बिना सूत्र से बंधे हुए, सीमित बहुलता में फैलता है, इसी तरह यह [पैगम्बरी कथन] एक उग्रता है जो सार रहित है, जो बिना फैलाव के निरा जोश है, और यह सतहीपन ही है। चित्त की ताकत उतनी ही प्रबल होती है जितनी उसकी अभिव्यक्ति होती है, उसकी गहराई उतनी ही गहरी होती है जितनी वह अपने आप को विस्तार करके अपने प्रकटन में खो जाने का साहस करता है। इसके अलावा, जब यह अवधारणा-रहित जड़-वस्तुगत ज्ञान आत्म को परम सत्य में तल्लीन कर देने का दावा करता है, और सच्चाई और पवित्रता से चिंतन करने का भी दावा करता है, तब वह अपने आप को भ्रमित करता है: ईश्वर में आत्म-समर्पण करने के बजाय, आकलन और निर्धारण को नकारकर यह सिर्फ कभी बेतरतीब अंतर्वस्तु और कभी अपनी मनमानी को खुली छूट देता रहता है। जब वे सत्व के बेलगाम उफ़ान में आत्म समर्पण करते हैं, वे मान लेते हैं कि आत्म-चेतना पर चादर ओढ़कर, और सूझ बूझ को त्याग कर, वे ईश्वर के प्रिय पात्र हो जाते हैं, जो उन्हें नींद में ज्ञान देता है; और इस लिए वस्तुतः वे नींद में पाए हुए बीज से जो उत्पन्न करते हैं, वे सपने ही होते हैं।
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वैसे, यह देखना मुश्किल नहीं है कि हमारा यह ज़माना एक नए दौर के जन्म और परिवर्तन का वक्त है। चित्त अपने पहले की ज़िंदगी और विचारों की दुनिया से बिछड़ गया है, और उसे अतीत में डुबो रहा है; यह अपने ही रूपांतरण में लगा हुआ है। वास्तव में, चित्त कभी स्थिर नहीं रहता, बल्कि हमेशा आगे बढ़ने में लगा रहता है। मगर जैसे भ्रूण अपने लंबे अरसे के शांतिपूर्ण पुष्टि के बाद पहली सांस लेकर मात्रात्मक वृद्धि की क्रमिकता को तोड़ता है – एक गुणात्मक छलांग – और अब बच्चा पैदा होता है; वैसे ही चित्त जो अपने को उन्नत करते हुए धीरे धीरे और चुपचाप परिपक्व होकर एक नया रूप लेता है, थोड़ा-थोड़ा कर के पुरानी दुनिया की संरचना को पिघला देता है, जिसका अस्थायित्व सिर्फ बिखरे हुए लक्षणों में दिखाई देता है: स्थापित व्यवस्था में फैले हुए तुच्छता और नीरसता, अज्ञात भविष्य के बारे में धुंधली उत्कंठा, आने वाले बदलाव के सूचक हैं। इस उत्तरोत्तर ढहने की प्रक्रिया को, जो पूर्ण इकाई की रूपाकृति को बदलता नहीं है, उसे उगता सूरज व्यवहित करता है और बिजली की तरह अचानक नई दुनिया की रूपरेखा को विकसित करता है।
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एक नवजात शिशु की तरह ही इस नई दुनिया का पूर्ण यथार्थता नहीं होता है; और इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। पहला आविर्भाव केवल इसकी प्रारंभिक अवस्था या इसकी अवधारणा है। ठीक जैसे एक इमारत उसकी नींव डलने पर पूरी नहीं हो जाती है, वैसे ही संपूर्णता की [अब तक] उपलब्ध अवधारणा संपूर्णता नहीं होती है। जब हम एक बरगद को उसके तने की शक्ति और उसकी शाखा-प्रशाखाओं का फैलाव, और उसके पत्तों की ढेर में देखना चाहते हैं, तब उसकी बीज दिखाने पर हमें संतुष्टि नहीं होती। इसी तरह विज्ञान, जो चित्त की दुनिया का ताज है, शुरुआत में सम्पूर्ण नहीं होता। इस नए चित्त की शुरुआत, संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का व्यापक रूपांतरण; एक जटिल और पेचीदा सफर का फल; और उतनी ही बड़ी और कड़ी मेहनत का परिणाम है। यह शुरुआत वह संपूर्णता है जो क्रमानुसार वृद्धि और प्रसार के बाद अपने आप में लौट कर आती है, और यह संपूर्णता की सादी अवधारणा बन जाती है। इस सादी संपूर्णता की यथार्थता यह है: ये विन्यास जो संपूर्णता के भाग बन गये हैं, फिर से नए तरीके से विकसित होकर, नए परिप्रेक्ष्य में, एक उभरते हुए समझ के साथ नए विन्यास बनते हैं।
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एक तरफ इस नई दुनिया का पहला रूप केवल सरलता से ओड़ा हुआ संपूर्णता है, या संपूर्णता का अविशिष्ट बुनियाद है। लेकिन चेतना में पूर्व अस्तित्व का प्राचुर्य अभी भी याददाश्त में मौजूद है। इस नए बनते हुए रूप में, चेतना अंतर्वस्तु की व्यापकता और विशिष्टता को पकड़ने में चूक जाती है; इसके अलावा यह [चेतना] संरचना की अभिव्यक्ति, जिसके ज़रिए ठोस संबंधों में विशिष्टता पक्की तरह से निर्धारित और क्रमित होती है, उसको पकड़ नहीं पाती है। इस संबंध स्थापन के बिना, विज्ञान सार्विक समझ के बाहर रह जाता है, और यह धारणा देता है कि यह कुछ गिने चुने लोगों की गुप्त संपत्ति है;—गुप्त संपत्ति क्योंकि अब तक इसकी मौजूदगी सिर्फ अवधारणा में ही है, या सिर्फ उसका बीजकोष मौजूद है;—गिने चुने लोगों की, क्योंकि इसका अविस्तारित रूप इसके अस्तित्व को एक अनूठी चीज बना देता है। केवल वही जिसकी पूरी तरह से व्याख्या की गई हो, वह साथ ही साथ सर्व-सुलभ और समझने लायक होती है, और जिसे सब सीखकर अपनी संपत्ति बना ले सकते हैं। विज्ञान का बोधगम्य रूप ही विज्ञान का रास्ता है, जो सब के लिए खुला है, और सब के लिए समान रूप से सुलभ है; विज्ञान की तरफ बढ़ती हुई चेतना का यह सही मांग है कि तार्किक ज्ञान की उपलब्धि समझ के साथ हो, क्योंकि समझ चिंतन ही है, व्यापक अर्थ में निजी व्यक्तित्व है। और जो बोधगम्य है, वह विज्ञान और अवैज्ञानिक चेतना दोनों के लिए पहले से ही विदित है, जिससे अवैज्ञानिक चेतना तुरंत विज्ञान में प्रवेश कर सकती है।
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शुरु में जब विज्ञान को न पूरी जानकारी हो, और न ही सम्पूर्ण संरचना हासिल हो, तब इसे इन वजहों से आलोचना का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर इस आलोचना से विज्ञान के सत्व पर संशय पैदा हो, तो वह अनुचित होगा; और विज्ञान के क्रम-विकास के लिए की गई मांग को अस्वीकार करना उतना ही अनुचित होगा। ऐसा लगता है कि यह द्वन्द्व वह सबसे अहम गुत्थी है जिस से वैज्ञानिक विचारधारा फिलहाल जूझ रही है, और जिसको अब तक ठीक से समझ नहीं पायी है। एक पक्ष अपने तथ्य की बहुलता और उसकी बोधगम्यता पर जोर देता है, और दूसरा पक्ष कम से कम इस बोधगम्यता की निंदा करते हुए अपने अमध्यस्थ तर्क और दिव्यता पर जोर देता है। हालांकि, निरे सत्य के जोर से या दूसरे पक्ष के धौंस से पहला पक्ष चुप करा दिया जाता है, और हालांकि अहम तत्व के मूल सिद्धांतों से वह अभिभूत हो जाता है, फिर भी किसी भी सूरत में वह अपने मांगों के संदर्भ में संतुष्ट नहीं होता है: मांग जायज़ हैं, लेकिन पूरे नहीं होते। इसकी चुप्पी सिर्फ आधा ही [दूसरे पक्ष के] जीत की वजह से होता है, लेकिन [दूसरे] आधे की वजह है, ऊब और बेपरवाही जो निरंतर अमल नहीं किए गए वादों और उम्मीदों से पैदा होते हैं।
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जहां तक विषयवस्तु का सवाल है, कभी-कभी दूसरे पक्ष के लोग [शेलिंग के समर्थक] यकीनन अपने लिए विषयवस्तु की व्यापकता को हासिल करना आसान कर लेते हैं। वे अपने दायरे में ढेर सारी सामग्री ले आते हैं, अर्थात वह सामग्री जो परिचित और सुव्यवस्थित हैं; और मुख्यतः विचित्रता और अनोखापन पर ज़ोर देते हैं। और इस लिए ऐसा लगता है कि उनके कब्ज़े में वह सब कुछ है जो प्रस्तुत जानकारी ने अपने तरीके से पहले से ही प्रबंधित किया है; इसके अलावा यह भी लगता है कि जो कुछ अभी भी अव्यवस्थित है, वह भी उनके काबू में है। और इस लिए वे सब कुछ परम प्रत्यय[9] के अंतर्गत लाते हैं, जो [परम प्रत्यय] इस तरह से सब कुछ में दिखने लगता है, और एक परिपक्व विस्तृत विज्ञान जैसे लगने लगता है। लेकिन बारीकी से जांच करने पर दिखता है कि यह विस्तार एक ही सिद्धांत के अलग-अलग रूप के स्वतः अंगीकरण से नहीं हुआ है, बल्कि एक ही सिद्धांत का बेतरतीब दोहराना है जो अलग-अलग वस्तु पर बाहरी तरीके से छापा जाता है, और विविधता का एक उबाऊ रूप ले लेता है। प्रत्यय अपने आप में यकीनन सही होता है, लेकिन अगर इसका संवर्धन केवल एक ही फ़ार्मुले के दोहराने तक सीमित रहता है, तो वस्तुतः वह हमेशा प्रारम्भिक स्तर पर ही रह जाता है। जब एक सचेतन व्यक्ति/कर्ता[10] इस एक ही निश्चल अभिरूप को हर एक विषय पर लागू करता है, मसलन जब यह विषय इस प्रवाहहीन तत्व में बाहर से डुबोया जाता है, तब इस प्रक्रिया से विषय-वस्तु की सतही धारणा से बढ़कर असली लक्ष्य को हासिल नहीं किया जाता है। मतलब, यह इसके [प्रत्यय के] भीतर से उमड़ते हुए बहुल आकार और उनके आत्म-निर्धारित विविधीकरण नहीं है। बल्कि यह एक एकरंगा नियम-निष्ठता है, जो तथ्य के विविधता तक सिर्फ इस लिए पहुंच पाता है, कि तथ्य पहले से ही बना-बनाया और परिचित है।
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फिर भी यह नियम-निष्ठता इस नीरस और सैद्धांतिक सार्वभौमिकता[11] को परम तत्व के रूप में पेश करता है; यह हमें समझाता है कि इसके बारे में असंतुष्टि, सार्वभौमिक दृष्टिकोण को आत्मसात करके हमारी वहाँ टिके रहने की नाकामयाबी को दिखाता है। अतीत में, एक दृष्टिकोण को गलत साबित करने के लिए, किसी बात को अलग तरीके से कल्पना करके पेश करने की खोखली संभावना ही काफी होती थी, और इस संभावना (यानी कि [निस्सार] सार्वभौमिक सोच) में ही, वास्तविक संज्ञान का पूरा महत्व निहित था। यहाँ भी हम देखते हैं कि सार्वभौमिक सोच का ऐसे अवास्तविक रूप को ही महत्व दिया जाता है, और विशिष्टता और निश्चितता के विघटन (यानी कि इनको किसी अंदरूनी विकास या तर्कसंगतता के बिना ही शून्यता के अतल खाई में निर्वासित करना) को ही तार्किक-वैचारिक पद्धति[12] का नाम दिया जाता है। किसी चीज़ के अस्तित्व को परम तत्व के रूप में विचारने का अर्थ केवल उसके बारे में यह कहना कि बेशक हमने अभी इसके बारे में बात की थी जैसे कि यह कोई विशेष वस्तु है, लेकिन परम तत्व में (जहां क = क[13] का नियम लागू है) ऐसा कुछ नहीं होता है; परम तत्व में सब कुछ एक ही होता है। इस एकमात्र अंतर्दृष्टि—यानी कि परम तत्व में सब कुछ एक ही होता है—को विभेदकारी और सर्वग्राही संज्ञान, या पूर्णता को खोजती और उसकी मांग करती हुई संज्ञान के मुकाबले खड़ा करना (या परम तत्व को रात के रूप में समझना—जिसमें, जैसे कि कहा जाता है, सब गायें काली दिखती हैं)—यह एक रिक्त संज्ञान की नादानी है।—यह नियम-निष्ठता, जिसकी हाल के फलसफे ने निंदा की थी और धिक्कारा था, वह इसी फलसफे के अंतर्गत पुनर्जीवित हुआ है। इस नियम-निष्ठता की कमियों की जानकारी और एहसास होने के बावजूद, यह विज्ञान से नहीं मिटेगा जब तक सम्पूर्ण यथार्थता[14] के स्वरूप के बारे में पुरी तरह से स्पष्ट समझ नहीं होगी।–किसी विचार को अमल में लाने से पहले, अगर उसके बारे में एक साधारण अंदाज़ा हो, तो उसे कार्यान्वित करना आसान होता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए, यहाँ इसका एक मोटा-मोटा इंगित देना फायदेमंद होगा; साथ ही साथ इस मौके पर [मेरा] यह इरादा है कि कुछ सोचने के तरीकों को हटाया जाए, जिनकी आदतन स्वीकृति दार्शनिक संज्ञान के लिए अंतराय हैं।
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मेरा विचार (जो संरचना की प्रस्तुतिकरण से ही सही ठहराया जाएगा) है कि परम सत्य की केवल जड़ सत्व[15] जैसे नहीं, पर साथ ही साथ [आत्म-सचेतन] व्यक्ति के रूप में संकल्पना करके उसे व्यक्त करने पर सब कुछ निर्भर करता है। यहाँ, यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि [सक्रिय] सार्वभौमिक[16], अर्थात ज्ञान की अमध्यस्थता[17] और साथ ही साथ अमध्यस्थ अस्तित्व, या ज्ञान के लिए अमध्यस्थता, भी सत्वता[18] में शामिल हैं। जब ईश्वर को एक-तत्व के रूप में संकल्पना या परिभाषित की गई[19], तो उस समय की सोच को झटका लगा। कुछ हद तक इस का कारण यह सहज-ज्ञान था कि आत्म-सचेतनता ऐसी संकल्पना में लीन हो जाती है, और [उसका कोई अंश] संरक्षित नहीं रहती। इसके विपरीत, जो संकल्पना[20] सोच को [निरा] सोच, यानी कि [निरा, तात्विक] सार्वभौमिकता मान कर उस पर अड़ा रहता है—वह भी वही सतही या अविभेदित सत्वता है। और तीसरी बात[21] यह है कि, जब सोच जड़-तत्व के अस्तित्व को अपने में समा लेती है, और अमध्यस्थता या अंतर्दृष्टि को निरा सोच मानती है, तो सवाल यह उठता है कि क्या यह बौद्धिक अंतर्दृष्टि महज़ निर्जीव सरलता[22] में फिर से फिसल कर नहीं गिर जाती है, और यथार्थता को ही अयथार्थ तरीके से नहीं पेश करती है?
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इसके अलावा, सजीव मूलतत्व वह अस्तित्व है, जो असल में [आत्म-सचेतन] व्यक्ति है, यानी कि वह अस्तित्व सिर्फ उस हद तक यथार्थ है, जहां वह [सजीव मूलतत्व से अलग होकर] आत्म-उत्थान की प्रक्रिया है; और उस ‘आत्म’ और इस अलग होने की प्रक्रिया का [पुन:] सम्मेलन[23] है। व्यक्ति के रूप में, [सजीव] जड़-तत्व महज़ नकारात्मकता है, और इसी वजह से निरा तत्व का द्विभाजन है; और वह दोहराने की विपरीत प्रणाली[24] है जो फिर से इस अनियत विविधता[25] और उसके विपक्ष को नकारता है। सिर्फ आत्म-पुनरुद्धारित एकत्व[26] (ना कि प्रारम्भिक एकत्व[27], और ना ही अमध्यस्थ एकत्व[28]) या अन्यता[29] में स्वयं की प्रतिवर्तन ही सत्य है। सत्य वह है जो अपने आप में परिणत होता[30] है; वह वृत्त जो मुकम्मल होना ही अपना लक्ष्य मान कर चलता है; और जिसका अंजाम फिर से उसकी शुरुआत है; और वह लक्ष्य के मुकम्मल होने के ज़रिए ही यथार्थ होता है।
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इस तरह से [ऊपर कही गई बातों को ध्यान में रखते हुए] ईश्वर का अस्तित्व और दैवी संज्ञान को प्रेम का अपने साथ विनोदन ज़रूर कहा जा सकता है; लेकिन अगर इस सोच में संजीदगी, दर्द, धैर्य, और नकारने की मेहनत मौजूद न हो तो यह महज़ उपदेश ही नहीं, बल्कि नीरसता के स्तर पर उतर आती है। अपने आप में यह जीवन संतुलित और स्वयं-सम्पूर्ण है, जिसका ना अन्यता और विच्छेद और ना ही उस विच्छेद से उभरने का कोई वास्ता है। पर यह स्वयं-में[31] होना अमूर्त सार्वभौमिकता है, जिसमें इस जीवन की प्रकृति, स्वयं-के-लिए[32] होना, और इस तरह व्यापक अर्थ में [जैविक] संरचना का [ठोस] आत्म-गठन, उपेक्षित हो जाता है। अगर संरचना और सार[33] को एक ही माना जाए, तो फलस्वरूप यह गलतफ़हमी हो सकती है कि संज्ञान के लिए स्वयं-में होना या सार काफी है, और संरचना को नज़रंदाज़ किया जा सकता है—यानी कि परम सिद्धांत या परम अंतर्दृष्टि की ओर से देखा जाए तो सार का सम्पूर्ण होना, या संरचना का बनना, निरर्थक हो जाता है। सार के अपने महत्वपूर्णता में संरचना का समान महत्वपूर्ण होने के बावजूद सार की कल्पना और अभिव्यक्ति केवल सार के रूप में नहीं कर सकते हैं, यानी कि उसे अमध्यस्थ मूलतत्व[34] या ईश्वर का अप्रभावित आत्म-अंतर्दृष्टि नहीं मान सकते है; बल्कि उन्हें उतना ही संरचना के रूप में, और विकसित संरचना की संपन्नता के रूप में संकल्पना करना चाहिए। केवल इसी तरह से वास्तविक रूप में सार की संकल्पना और अभिव्यक्ति हो सकती है।
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सत्य संपूर्णता है। लेकिन, संपूर्णता वही सार है जो अपने विकसित होने से परिपूर्ण होता है। परम तत्व के बारे में यह कहना ज़रूरी है कि वह वास्तव में नतीजा है, और अंत में ही उसका वास्तविक रूप उभरता है। और यही उसकी प्रकृति है: यथार्थ होना, व्यक्ति/कर्ता होना, या अपने-आप-में-सम्पूर्ण-बनना[35]। हालांकि यह विरोधात्मक लग सकता है कि परम तत्व को आवश्यक रूप से नतीजा माना जाए। मगर थोड़ा विचार करने से इस विरोधात्मकता का आभास मिट जाता है। उद्भव, सिद्धांत, या परम तत्व, जिसे शुरू में अनायास व्यक्त किया जाता है, वह सिर्फ [तात्विक] सार्वभौमिकता है। अगर मैं कहूँ ‘सारे पशु’ तो ये शब्द जीवविज्ञान के बराबर नहीं होते हैं; इसी तरह यह भी ज़ाहिर है कि दैविक, परम तत्व और शाश्वत आदि शब्द उनके अंतर्निहित अर्थ को व्यक्त नहीं करते हैं;—और केवल ऐसे शब्द ही अंतर्दृष्टि को अमध्यस्थ के रूप से व्यक्त करते हैं। ऐसे शब्द के परे जो कुछ है, चाहे वह एक कथन की तरफ संक्रमण ही हो, उसमें एक अन्य-बनना और वापस-लौटना समाया हुआ है—यह मध्यस्थता [पुनः-सम्मेलन, चिंतन] है। पर यही मध्यस्थता[36] [चिंतन] नाराज़गी पैदा करती है, जैसे कि परम प्रज्ञान को त्याग दिया जाता है जब कोई मध्यस्थता को इस [निम्नलिखित समझ] से ज्यादा महत्व देता है: कि यह [मध्यस्थता] परम सत्य नहीं है, और परम सिद्धांत में इसका कोई स्थान नहीं है।
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वास्तव में मध्यस्थता और परम प्रज्ञान[37] की प्रकृति से अपरिचय की वजह से यह नाराज़गी पैदा होती है। क्योंकि मध्यस्थता और कुछ नहीं, बल्कि स्वचालित[38] आत्म-गठन[39], आत्म-चिंतन, आत्म का वह पहलू जो स्वयं-के-लिए है, निरा नकारात्मकता[40] या, निरा अमूर्त रूप में सारतः बनना है। स्वयंता[41] (या व्यापक रूप से बनना) की सहजता की वजह से, यह मध्यस्थता, बनने की प्रक्रिया में निश्चित रूप से अमध्यस्थता[42] ही है, और अमध्यस्थ[43] भी है। इस तरह से, प्रज्ञा को समझने में गलतफहमी होगी अगर प्रतिवर्तन[44] को सत्य से बाहर रखा जाए, और उसे परम तत्व का सकारात्मक पहलू न माना जाए। प्रतिवर्तन ही सत्य को नतीजा बनाता है, और इस [मध्यस्थता और अ- मध्यस्थता के बीच] विरोधात्मकता को बनने में परिणत[45] करता है; क्योंकि यह बनना उतना ही सहज है, और इस लिए सत्य की संरचना से अलग नहीं है, जो अपने आप को नतीजे में सहजता के रूप में पेश करता है; असल में यह [बनना] सहजता में वापस रूपांतरित होना है। हालांकि भ्रूण स्वयं में मनुष्य ज़रूर है, यह स्वयं के लिए मनुष्य नहीं है; परिपक्व तर्क-शक्ति के ज़रिए ही यह स्वयं के लिए मनुष्य बनता है, और यही उसको स्वयं [की सहजता] में वापस लाता है। यही इसकी यथार्थता है। लेकिन यह नतीजा सहज अमध्यस्थता है, क्योंकि यह आत्म सचेतन स्वतंत्रता है, जो अपने आप में सुस्थिर है और विरोधात्मकता को अस्वीकार करके छोड़ देने के बजाय उसके साथ सामंजस्य बनाये रखता है।
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अब तक कही हुई बात को हम ऐसे भी कह सकते हैं कि प्रज्ञा उद्देश्यपूर्ण सक्रियता[46] है। ऊददेश्यपूर्णता के [बाह्य] रूप के आम तौर पर बदनाम होने के कारण ये हैं – तथाकथित प्रकृति को (गलत ढंग से समझी गई) सोच के ऊपर प्रधानता देना, और खास कर के बाहरी उद्देश्यपूर्णता[47] का बहिष्करण करना। फिर भी, जिस तरह से अरस्तू भी प्रकृति को उद्देश्यपूर्ण सक्रियता मानते हैं, जहां उद्देश्य सन्निहित और स्थिर है, जो खुद अचल होते हुए प्रवर्तक/चालक है, इसी अर्थ में यह कर्ता है। इस प्रवर्तन करने की शक्ति को बोधात्मक रूप से देखा जाए तो यह स्वयं-के-लिए-होना है, या निरा नकारात्मकता है। नतीजा शुरुआत जैसा है, सिर्फ इस लिए कि शुरुआत उद्देश्य है;--या, यथार्थता और उसकी अवधारणा एक ही हैं; इसकी वजह सिर्फ यह है कि अमध्यस्थ (जो उद्देश्य ही है) में आत्म या निरा यथार्थता समाहित है। हासिल किया गया उद्देश्य या यथार्थता जो सिद्ध हुआ है, वह क्रियाशीलता है, और बनने का प्रकटन है। लेकिन यह अस्थिरता ही आत्म है। और आत्म शुरुआत की उस अमध्यस्थता और सरलता के बराबर है, क्योंकि यह [आत्म] नतीजा है, जो स्वयं में वापस लौटा है। लेकिन जो स्वयं में वापस लौटा है, वह आत्म ही है, और आत्म वह समानता और सरलता है, जो अपने को अपने साथ जोड़ता है।
परम तत्व को व्यक्ति/कर्ता के रूप में प्रस्तुत करने की इच्छा से इन प्रस्तावों का उपयोग किया गया: ईश्वर शाश्वत है[48], या नैतिक विश्व-व्यवस्था है, या प्रेम है, इत्यादि। ऐसे प्रस्तावों में परम तत्व को सीधे कर्ता के रूप में माना गया है; न कि एक गतिविधि जो अपने आप में प्रतिवर्तित होती है। ऐसा प्रस्ताव ईश्वर शब्द से शुरू होता है। अपने आप में यह एक निरर्थक ध्वनि है, केवल एक नाम; सिर्फ विशेषण ही बताता है कि ईश्वर क्या है, उनकी सिद्धि और अर्थ क्या है; खोखली शुरुआत अंत में जा कर ही “यथार्थ”[49] ज्ञान बनता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यह देखा जाए तो समझ में नहीं आता है कि वे शाश्वत, या नैतिक विश्व-व्यवस्था इत्यादि की बात साफ-साफ क्यों नहीं करते, या पूर्वजों की तरह, निरा अवधारणा, सत्ता[50], अद्वितीय, इत्यादि यानी कि निरर्थक ध्वनि [“ईश्वर”] के बजाय उसके अर्थ के बारे में बात क्यों नहीं करते। लेकिन यही शब्द [“ईश्वर”] इस बात की तरफ इशारा करता है कि जो माना जा रहा है, वह एक सत्ता, या सार, या व्यापक रूप से विश्वव्यापी नहीं है, लेकिन एक व्यक्ति/कर्ता है जो अपने आप में प्रतिवर्तित होता है।
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मगर साथ ही साथ यह प्रत्याशित ही है। व्यक्ति/कर्ता को एक स्थिर बिन्दु माना जाता है, जिसके सहारे विशेषण एक [बाहरी सोच की] गतिविधि से जोड़े जाते हैं। यह गतिविधि उस व्यक्ति का है, जिसे इस व्यक्ति/कर्ता के बारे में ज्ञान है, न कि उस बिन्दु की अपनी [गतिविधि] है; मगर इस [‘बिन्दु’ के] गतिविधि के ज़रिए ही इस विषयवस्तु को व्यक्ति/कर्ता के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। जिस तरह से यह [उपरोक्त व्यक्ति/कर्ता की] गतिविधि गठित है, वह व्यक्ति/कर्ता का नहीं हो सकता है। फिर भी इस बिन्दु के पूर्वकल्पना के अनुसार, यह गतिविधि भी और किसी और तरह से गठित नहीं हो सकती है, यह केवल बाहरी ही हो सकती है। इस लिए, यह प्रत्याशा करना कि परम तत्व एक व्यक्ति/कर्ता है, न ही इस अवधारणा का यथार्थता नहीं है, बल्कि इस यथार्थता को असंभव बना देता है; क्योंकि यह प्रत्याशा अवधारणा को एक स्थिर बिन्दु मानता है, जब कि [अवधारणा का] स्व-चालन ही यथार्थता है।
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अब तक जो कहा गया है, उससे कई निष्कर्ष निकल सकते हैं, जिन में से इस बात को महत्व दिया जा सकता है: ज्ञान सिर्फ यथार्थ है, और यह केवल विज्ञान या पद्धतिबद्ध सोच के रूप से पेश किया जा सकता है; इसके अलावा, फलसफे का कोई प्राथमिक प्रस्ताव या सिद्धांत, अगर सच है तो, वह गलत भी है, जहां तक कि वह केवल एक प्राथमिक प्रस्ताव या सिद्धांत होता है। इस लिए उसका खंडन करना आसान होता है। उस [प्रस्ताव] की कमी की तरफ ध्यान दिलाना ही खंडन है; और वह एक कमी है क्योंकि वह केवल सार्वभौमिकता या सिद्धांत है, केवल एक शुरुआत। अगर यह खंडन पक्का है, तो वह सिद्धांत से ही उत्पन्न और विकसित किया जाता है – न कि उसके खिलाफ बाहर से लाए गए समर्थन और सुझाव से सिद्ध होता है। अतः खंडन वास्तव में सिद्धांत का विकास होगा, और इस तरह इसकी कमी की सुधार होगी, अगर वह सिर्फ इसकी नकारात्मक गतिविधि पर ध्यान देकर, और सकारात्मक पक्ष पर इसकी प्रगति और परिणाम के प्रति अचेत रहकर, स्वयं को गलत न समझे।–शुरुआत का यथार्थ सकारात्मक वास्तविकीकरण[51], साथ ही साथ विपरीत रूप से, उसकी तरफ एक नकारात्मक रवैया है, यानी कि उसकी [शुरुआत की] एकतरफा रूप की तरफ, जिसमें वह केवल अमध्यस्थ या आशय होता है। इस तरह से ऐसा माना जा सकता है कि वास्तविकीकरण व्यवस्था [सिस्टेम] के आधार का खंडन करता है; लेकिन यह कहना बेहतर होगा कि यह [वास्तविकीकरण] इस बात को ज़ाहिर करता है कि व्यवस्था का आधार या सिद्धांत असल में केवल उसकी शुरुआत है।
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सत्य केवल व्यवस्था/सिस्टेम के रूप में ही वास्तव है, या मूलतत्व ही वास्तव में व्यक्ति/कर्ता है—ऐसा निरूपण उपरोक्त कथन को व्यक्त करता है, और परम तत्व को चित्त के रूप में पेश करता है। यह निरूपण आधुनिक काल और इसके मज़हब की सब से उन्नत अवधारणा है। केवल आध्यात्मिक ही वास्तव है; वह सत्व है, या जो-स्वयं-में-है; परस्पर-संबंधी और निर्धारित, अन्य-होना और स्वयं-के-लिए-होना — और जो इस निर्धारितता में, और अन्य-में-होते-हुए भी स्वयं में मौजूद रहता है; — या यही [आध्यात्मिक] स्वयं-में-और-स्वयं-के-लिए है। लेकिन शुरू में, यह स्वयं-में-और-स्वयं-के-लिए-होना सिर्फ हमारे[52] लिए है, या स्वयं-में [अचेतन] है, या यह आध्यात्मिक मूलतत्व है। इसे अपने लिए भी यह [स्वयं-में-और-स्वयं-के-लिए] होना चाहिए; आध्यात्मिक का ज्ञान होना [बनना] चाहिए; और स्वयं ही चित्त है, इसका ज्ञान होना चाहिए। यानी कि खुद के लिए विषयवस्तु बनना चाहिए, लेकिन ऐसा विषयवस्तु जो साथ ही साथ उदात्तीकृत[53] है, और अपने आप में प्रतिवर्तित[54] है। जहां तक कि इसका आध्यात्मिक विषयवस्तु अपने से ही उत्पन्न [अचेतन रूप से] होता है, यह सिर्फ हमारे लिए ‘स्वयं-के-लिए’ है। लेकिन जहां तक कि इस स्वयं-के-लिए होना स्वयं के लिए भी है [सचेतन रूप से], यह स्व-निर्माण[55], निरी अवधारणा, साथ ही साथ एक वस्तुगत तत्व[56] है जिसमें इसकी मौजूदगी निहित है, और इस तरह से, अपनी मौजूदगी में यह स्वयं के लिए एक विषयवस्तु है जो अपने आप में प्रतिवर्तित है। वह चित्त जो, इस तरह से विकसित हो कर, अपने आप को चित्त के रूप में पहचानता है, यही विज्ञान है; विज्ञान इसकी यथार्थता और क्षेत्र है जो वह अपने तत्व से अपने लिए निर्मित करता है।
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सम्पूर्ण अन्यत्व[57] में निरा आत्म-प्रज्ञान[58] – यह माध्यम [ईथर] – विज्ञान का आधार और ज़मीन है; यही सार्वभौमिक रूप में ज्ञान है। फलसफे की शुरुआत यह मान के चलती है, या यह मांग करती है, कि चेतना इस माध्यम में बसी रहे। लेकिन सिर्फ अपने बनने की प्रक्रिया से ही यह माध्यम अपनी परिपूर्णता और पारदर्शिता हासिल करता है। यह निरी आध्यात्मिकता[59] है, जो सादी अमध्यस्थता[60] के रूप में सार्वभौमिक है;--यह [मुकम्मल] सादगी[61], जब सादगी के रूप में मौजूद होती है, तब यह वह ज़मीन है जो कि चिंतन है, और केवल चित्त में ही बसती है। क्योंकि यह माध्यम, चित्त की यह अमध्यस्थता, जो व्यापक रूप से चित्त का मूलतत्व है – यह अमध्यस्थता रूपांतरित सारत्व है, एक ऐसा प्रतिवर्तन है, जो अपने आप में सरल है, और अपने लिए अमध्यस्थ है – एक ऐसा अस्तित्व जो अपने आप में प्रतिवर्तित है। विज्ञान अपनी तरफ से यह मांग करता है कि आत्म-सचेतनता इस माध्यम में आरोहण करे, ताकि उसके लिए विज्ञान के साथ जीना, और उसमें बसना संभव हो। दूसरी तरफ, किसी व्यक्ति को विज्ञान से यह मांग करने का हक है कि वह उसे इस दृष्टिकोण तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ी दे, उसे अपने ही भीतर इस दृष्टिकोण को दिखाए। इस हक का आधार यह है कि उसे मालूम है कि उसके ज्ञान की हर एक पहलू में उसकी सम्पूर्ण स्वाधीनता है; क्योंकि हर पहलू में, चाहे वह विज्ञान को स्वीकार्य हो या नहीं, और उसका विषयवस्तु जो भी हो, व्यक्ति परम संरचना है, यानी कि वह स्वयं की अमध्यस्थ निश्चितता है, और इस लिए, चाहे तो ऐसा कहा जा सकता है कि वह शर्तहीन[62] अस्तित्व है। सचेतनता का दृष्टिकोण इस में निहित है: बाह्य वस्तु को स्वयं के विपरीत जानना, और स्वयं को इन वस्तुओं के विपरीत जानना। अगर विज्ञान[63] इस दृष्टिकोण को अन्य[64] समझता है—यानी कि इस दृष्टिकोण (जिसमें चेतना जानती है कि वह अपने आप में तुष्ट है) को चित्त का नाश हो जाना मानता है—तो दूसरी तरफ विज्ञान का यह माध्यम चेतना के लिए एक दूरस्थ इलाका है जहां वह [चेतना] अब अपने काबू में नहीं है। दोनों पक्षों को लगता है कि दूसरा पक्ष सत्य का उलटा रूप है। मामूली सचेतनता, जब अपने आप को विज्ञान के हवाले सौंपती है, वह नहीं जानती है कि वह क्या है जो उसे कम से कम एक बार के लिए भी सर के बल चलने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस गैर-मामूली रवैये को अपनाकर उस में चलने-फिरने का दबाव एक बेकार और अनर्थक हिंसा जैसा है, जिसे उसे स्वयं पर थोपने की अपेक्षा की जाती है।–विज्ञान अंतर्भूत रूप में जो भी हो, अमध्यस्थ आत्म-सचेतनता के साथ उसके संबंध में वह स्वयं को उलटी तरह से पेश करता है। और क्योंकि इस आत्म-सचेतनता की अपनी यथार्थता का सिद्धांत अपने स्वयं के प्रति निश्चितता में निहित है, विज्ञान अयथार्थता का रूप लेता है, क्योंकि यह [विशिष्टता का] सिद्धांत, स्वयं के लिए, विज्ञान के बाहर स्थित है। विज्ञान को ऐसे सिद्धांत को अपने साथ जोड़ना चाहिए, या [ऐसा कहना] बेहतर होगा कि वह यह बताए कि यह सिद्धांत उसका अंश ही है; और किस तरह से उसका अंश है। जब तक विज्ञान में यह यथार्थता नहीं होगी, तब तक इसका आशय सिर्फ स्वयं-में है, ऐसा अभिप्राय जो केवल अंदरूनी है, जो पूरी तरह से चित्त नहीं, बल्कि सिर्फ एक आध्यात्मिक तत्व है। इस स्वयं-में-होने को बाहर निकल कर स्वयं-के-लिए बनना पड़ेगा, और इसका अर्थ सिर्फ यह है कि इसे [विज्ञान को] यह जताना पड़ेगा कि आत्म-सचेतनता और विज्ञान अभिन्न हैं।
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यह चित्त की फेनोमेनॉलॉजी [दृश्यतात्वशास्त्र], व्यापक रूप से विज्ञान या ज्ञान के बनने की प्रक्रिया को दर्शाती है। शुरुआत में ज्ञान या अमध्यस्थ चित्त, चित्तरहित होता है – एक ऐंद्रिक चेतना। यथार्थ ज्ञान बनने के लिए, या विज्ञान के परिवेश को बनाने के लिए (जो विज्ञान की विशुद्ध अवधारणा है) इसे मेहनत का एक लंबा दौर तय करना पड़ेगा। यह बनना जब उभरती हुई विषयवस्तु और विभिन्न आकृतियों के साथ अपने आप को प्रस्तुत करता है, यह ऐसा नहीं होगा जैसा आम तौर पर एक अवैज्ञानिक चेतना को विज्ञान से परिचय कराने का तरीका समझा जाता है; यह विज्ञान के बुनियाद से भी काफी अलग होगा; -- और किसी भी सूरत में यह उस जोश से अलग होगा, जो पिस्तौल की गोली की तरह, सम्पूर्ण ज्ञान से शुरू होता है और दूसरे दृष्टिकोणों को विचार के अयोग्य घोषित करके उन्हें ख़ारिज करता है।
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व्यक्ति-विशेष[65] को उसके अशिक्षित स्तर से ज्ञान की तरफ ले जाने की प्रक्रिया को उसके व्यापक अर्थ में [अब तक] देखना पड़ा; और उसके शिक्षा के दौरान सार्वभौमिक व्यक्ति (आत्म-सचेतन चित्त) को ध्यान में रखना पड़ा।–जहां तक कि इन दो तरह के व्यक्तियों के बीच संबंध का सवाल है, सार्वभौमिक व्यक्ति जब अपने ठोस आकार और विन्यास को प्राप्त करता है, उसमें हर एक पहलू[66] उभरके आता है। व्यक्ति-विशेष एक अधूरा चित्त होता है, एक ठोस आकार जिसके समूचा मौजूद-होने[67] में एक सटीक पहलू हावी होता है, और बाकी पहलू धुंधले से रूपरेखा जैसे होते हैं। जब चित्त की एक बनावट दूसरे से ऊपर उभरके आती है, नीचे का ठोस मौजूद-होना सिमटकर एक तुच्छ पहलू बन जाता है; जो पहले एक प्रमुख मुद्दा था अब वह सिर्फ आभास बनकर रह जाता है और उसकी आकृति एक परदे की आड़ में धुंधली सी हो जाती है। व्यक्ति (जिसका मूलतत्व एक उच्च स्तर का चित्त है) इस अतीत [के तजुर्बे] से गुज़रता है, (जैसे कि कोई व्यक्ति जो एक उच्चतर विज्ञान से संलग्न होते समय, प्रारंभिक तथ्यों को, जो उसने पहले से ही समझ लिया है, फिर से जागृत करता है), और उसके विषयवस्तु को वर्तमान में लाता है; वह इस अतीत के पुनःस्मरण में दिलचस्पी लिए बिना और उस पर ज़्यादा ध्यान दिए बिना उसको जागृत करता है। व्यक्ति-विशेष को सार्वभौमिक चित्त के विषयवस्तु से संबंधित शैक्षिक चरणों से गुज़रना पड़ेगा—यानी कि [विषयवस्तु के] ऐसे आकार जिन्हें चित्त त्याग चुका है, ऐसे पड़ाव जिन्हें समतलित करके पथ तैयार किया गया है। इस तरह, जहां तक जानकारी का सवाल है, हम देखते हैं कि जो विषय अतीत में परिपक्व चित्त के व्यक्ति को व्यस्त रखता था, अब वह जानकारी के स्तर पर उतर आया है, जैसे अभ्यास, या तो फिर बचकाने खेल; और शैक्षणिक अनुक्रम में हम विश्व के शिक्षा के इतिहास को एक छाया-चित्र [सिल्हूट] की तरह पहचान पाएंगे। यह विगत मौजूदगी सार्वभौमिक चित्त का अर्जित गुणस्वभाव[68] बन चुका है, जो व्यक्ति-विशेष के मूलतत्व का गठन करता है; इस तरह, बाह्य रूप से प्रस्तुत होते हुए यह [मौजूदगी] व्यक्ति-विशेष का गैर-आंतरिक[69] [अजैविक] प्रकृति का गठन करता है।-- इस संदर्भ में, व्यक्ति-विशेष के दृष्टिकोण से, उसके सामने जो गैर-आंतरिक प्रकृति को प्रस्तुत किया गया है, उसे अपना कर अपने काबू में लाना, शिक्षण में शामिल है। लेकिन अगर मूलतत्व के रूप में [अविकसित] सार्वभौमिक चित्त के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मूलतत्व अपने आप को आत्म-सचेतनता [व्यक्ति विशेष के माध्यम से] देने के अलावा और कुछ नहीं है, और यह उसका बनना और उसके अपने आप में प्रतिवर्तन [दोनों] को उत्पन्न करता है।
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इस शैक्षणिक क्रम को विज्ञान समग्र वृत्तान्त और अनिवार्यता के साथ प्रस्तुत करता है। साथ ही साथ यह उसके विन्यास में वह सब कुछ, जो अब तक चित्त के पहलू और गुणस्वभाव में सिमट चुका है, उसको प्रस्तुत करता है। लक्ष्य यह है कि चित्त को ज्ञान के स्वरूप का परिज्ञान हो। अधैर्यता असंभव की मांग करती है, यानी कि मेहनत किये बिना लक्ष्य तक पहुंचना। एक तरफ इस पथ की पूरी अवधि को झेलना पड़ेगा, क्योंकि हर एक पहलू एक ज़रूरी अंग है;--दूसरी तरफ, हमें हर पहलू पर ध्यान देना पड़ेगा क्योंकि हर पहलू अपने आप में एक मुकम्मल अनोखा स्वरूप है, और इसे संपूर्णतः देखा जाना चाहिए, केवल वहीं तक, जहां तक कि इसकी निर्धारितता को एक सम्पूर्ण या संघनन के रूप में माना जाता है, या सम्पूर्ण को इस निर्धारितता के अनोखेपन के दृष्टिकोण से समझा जाता है।–क्योंकि व्यक्ति के मूलतत्व, [यानी कि] विश्व-चित्त, ने भी समय के लंबे दौर में इन पहलुओं से गुज़रने का सब्र रखा, और विश्व-इतिहास के भारी मेहनत को झेला, जहां उसने हर पहलू के अंतर्गत तमाम विषयवस्तु, जो उसमें समा सकते थे, उन्हें दिखाया, और क्योंकि विश्व-चित्त इससे कम मेहनत से सचेतनता प्राप्त नहीं कर सकता था, इस लिए विषय के तर्कानुसार व्यक्ति-विशेष अपने मूलतत्व को इस से हल्की मेहनत से कतई नहीं बूझ[70] सकता है; लेकिन साथ ही साथ उसे [व्यक्ति-विशेष को] कम मुश्किल होती है क्योंकि स्वयं-में यह सब कुछ सम्पन्न हो चुका है, -- विषयवस्तु अब यथार्थता को ढहाकर एक संभावना बन गया है, अमध्यस्थता के परे, अब तक उसके विन्यास का संक्षिप्तीकरण हो चुका है, यानी कि निरा वैचारिक-निर्माण हो चुका है। क्योंकि यह [विषयवस्तु] सोच के ज़रिए से गुज़र चुकी है, अब यह विषयवस्तु मूलतत्व की संपत्ति/गुणस्वभाव बन गई है; मौजूदगी को स्वयं-में-होने के रूप में परिवर्तित करने की अब ज़रूरत नहीं है; क्योंकि यह निस्संदेह स्वयं-में ही है—अब वह केवल अपने प्रारम्भिक रूप में नहीं है, ना ही मौजूदगी में डूबा हुआ है—बल्कि उसका पुनःस्मरण हो चुका है, जिसे अब स्वयं-के-लिए-होने[71] के रूप में रूपांतरण करना है। इस प्रक्रिया के स्वरूप का और भी सटीक व्याख्या करने की ज़रूरत है।
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हमारे दृष्टिकोण के इस चरण पर, जहां हम इस प्रक्रिया को शुरू करते हैं, सम्पूर्ण के परिप्रेक्ष्य में जो नज़रन्दाज़ किया जाता है, वह है ठोस मौजूदगी का उदात्तीकरण[72]; लेकिन जो शेष रहता है, और जिसका उच्चतर पुनर्विन्यास होना है, वह है रूप[73] का आभास[74] और उस रूप के साथ हमारा परिचय। ठोस अस्तित्व जब पहली नकारात्मकता से मूलतत्व का अंग बन जाता है, वह पहले आत्म[75] के अवयव में केवल अमध्यस्थ रूप से ही रूपांतरित होता है; इस तरह यह संपत्ति/गुणस्वभाव जो आत्म ने हासिल किया है, उसका स्वरूप फिर भी असंकल्पित अमध्यस्थता और निश्चल उदासीनता का है, जैसा कि ठोस अस्तित्व में भी होता है; इस तरह से ठोस अस्तित्व एक आभास बनकर ही रह जाता है।–साथ ही साथ, इस तरह यह [आभास] एक परिचित चीज़ होती है, जिससे मौजूद[76] चित्त निपट चुका है; इस लिए, चित्त इसमें ना अपना ध्यान निवेश करता है, और फलस्वरूप, ना ही उसमें दिलचस्पी रखता है। अगर यह क्रिया जो ठोस अस्तित्व से निपट चुकी है, खुद सिर्फ विशेष चित्त की हरकत है, जो खुद को पूरी तरह से नहीं समझती है, तो, इसके विपरीत, ज्ञान इस आभास और इस परिचिति के खिलाफ एक पहल है; ज्ञान व्यापक आत्म की हरकत है, और [ज्ञान] चिंतन की रुचि है।
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जो आम तौर पर परिचित है, वह वाकई में अपरिचित है, ठीक इस लिए कि वह सुपरिचित [माना जाता] है। खुद को और दूसरों को बहकाने का आम तरीका यह है कि किसी खोज में यह मान के चलना कि कोई विषय परिचित है, और उसे स्वतः ग्रहण करना। इसके इर्द गिर्द तमाम गुफ्तगू के बावजूद ऐसा ज्ञान किसी काम का नहीं होता है, और ना ही वह [ज्ञान] समझता है की उसके साथ क्या हो रहा है। व्यक्ति और वस्तु, ईश्वर, प्रकृति, समझ, अनुभूति इत्यादि को अंधाधुंध परिचित और वैध नींव मान लिए जाते हैं, और वे सोच की हरकत के लिए अचल खूंटी बन जाते हैं। सोच इन खूँटियों के बीच फिरता रहता है, जब कि वे [खूंटी] खुद अचल रहते हैं; फलस्वरूप वह [सोच] सिर्फ [खूँटियों के] सतह पर ही मंडराता है। इस लिए समझने और जांचने का मकसद भी यही देखना है कि जो बात कही गई है, उसको हर कोई अपने प्रतिरूप[77] में पाता है या नहीं, और उस से परिचित है या नहीं।
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किसी प्रतिरूप का विश्लेषण, जैसे कि पहले किया जाता था, असल में तब भी उसकी परिचिति के रूप के उदात्तीकरण[78] के अलावा कुछ नहीं था। किसी प्रतिरूप को उसके मूलभूत तत्वों में विच्छेदन करने का अर्थ है, उसके [अंगभूत] पहलुओं पर लौटना, जो कम से कम हमारे परिचित प्रतिरूप के आकार में नहीं होते हैं, बल्कि वे आत्म के अमध्यस्थ संपत्ति/गुणस्वभाव के रचक होते हैं। असल में यह विश्लेषण सिर्फ ऐसे सोच तक ही पहुँच पाता है, जो अपने आप में परिचित, निर्धारित, और अचल निरूपण होते हैं। लेकिन इस तरह से जो अयथार्थता छँटके निकल आता है, वह खुद एक जरूरी पहलू है; क्योंकि ठोस तथ्य स्वतः-गतिशील होता है, सिर्फ इस वजह से कि वह अपने को विभाजित करता है और खुद को एक अवास्तविक वस्तु बनाता है। विभाजन की प्रक्रिया समझ की शक्ति और मेहनत होती है, सबसे अद्भुत और उत्कृष्ट शक्ति, या असल में परम शक्ति। मूलतत्व जो एक घेरे के अंदर बंद रहता है, और अपने पहलुओं को संभाले रखता है, यह अमध्यस्थ संबंध होता है, और इसी वजह से आश्चर्यजनक नहीं होता है। लेकिन आकस्मिकता, जो अपने आप में परिमित है, और जो दूसरी चीज़ों के संबंध में ही वास्तविक होती है, जब वह परिवेश से विच्छिन्न होती है [और अवास्तविक बनती है], वह एक अलग मौजूदगी और आज़ादी प्राप्त करती है – यह नकार[79] की ज़बरदस्त ताक़त है; यह सोच की ऊर्जा है, निरा मैं[80] की। मौत, अगर इस अयथार्थता को हम इस नाम से पुकारना चाहते हैं, सबसे खौफ़नाक चीज़ है, और जो मृत है, उस पर डटे रहने के लिए ज़बरदस्त ताकत की ज़रूरत है। बिन ताकत की खूबसूरती को समझ से नफरत है, क्योंकि समझ उस से यह [मृत पर डटे रहना] प्रत्याशा करती है, जबकि वह यह नहीं कर पाती है । लेकिन चित्त की जान, ऐसी जान नहीं है जो मौत से झिझकती हो, और ध्वंस से बचती हो; यह ऐसी जान है जो मौत को झेलती है और उसमें अपने आप को सुरक्षित रखती है। चित्त तभी अपने सत्य को उपलब्ध करता है, जब वह घोर तबाही में अपने आप को पाता है। यह वह ताकत नहीं है, जो सकार के रूप में नकार से आँखें फेर लेती है, जैसे हम किसी चीज के बारे में कहते है कि वह बेकार या गलत है, और फिर, उस से निपट के, मुँह मोड़कर किसी और विषय पर चले जाते हैं; चित्त की ताकत है नकार का सामना करना , और उस पर ठहरे रहना। नकार पर ठहरना वह जादुई ताकत है जो उसे [चित्त को] अस्तित्व में बदल देती है। यह ताकत वही चीज है जिसे हमने पहले व्यक्ति/कर्ता का नाम दिया था; वह व्यक्ति/कर्ता जो अपने तत्व में निश्चितता को मौजूदगी देकर, मूल[81] अमध्यस्थता का उदात्तीकरण करता है, यानी कि ऐसी अमध्यस्थता जो महज़ सामान्य है,[82] और फ़लस्वरूप यह [व्यक्ति/कर्ता, चित्त] असली मूलतत्व है: ऐसा अस्तित्व या अमध्यस्थता जिसका अपने बाहर कोई मध्यस्थता नहीं है, बल्कि जो खुद ही यह मध्यस्थता है।
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कोई भी प्रतिरूप [वास्तविकता का], विशुद्ध आत्म-सचेतनता का संपत्ति/गुणस्वभाव बन जाता है, लेकिन यह सार्वभौमिकता के तरफ उन्नयन व्यापक रूप से शिक्षा का सिर्फ एक पहलू है, मगर उसकी संपूर्णता नहीं है।–पुराकाल [यूनानी] में शिक्षा आधुनिक काल की शिक्षा से अलग थी: वह स्वाभाविक सचेतनता की वाकई में आद्योपांत शिक्षा थी। अपने ठोस-अस्तित्व के हर अंश पर अपनी ताकत खास करके लगा कर, और जो भी चीज उसके सामने आए, उस पर दार्शनिक चिंतन करके, इसने [स्वाभाविक सचेतनता] अपने आप को ऐसा सार्वभौमिकता बनाया जो पूरी तरह से सक्रिय था। इसके विपरीत आधुनिक काल में व्यक्ति [विद्यार्थी] को एक अमूर्त रूप[83] बना-बनाया मिलता है; इसको समझ कर अपना बनाने की कोशिश अधिकतर अंदरूनी अर्थ की अचिंतित पकड़[84] और सार्वभौमिकता का खंडित निर्माण होता है, ना कि ठोस वास्तव और मौजूदगी की विविधता से सार्वभौमिकता का उभरना। इस लिए अब जो करना है, वह यह नहीं कि व्यक्ति में ऐंद्रिक [अमध्यस्थ] अनुभव का शुद्धिकरण किया जाए, और उसे एक ऐसा मूलतत्व बनाया जाए जो सोचता है और जिसके बारे में सोचा जाता है; बल्कि इसके विपरीत, स्थिर निश्चित सोच का उदात्तीकरण करके सार्वभौमिक का वास्तवीकरण और संजीवीकरण किया जाए। लेकिन स्थिर सोच को प्रवाही अवस्था में लाना, ऐंद्रिक वास्तव को प्रवाही अवस्था में लाने से बहुत ज़्यादा मुश्किल है। इसकी वजह हमने अभी जो कहा उसमें है: इन निश्चित सोच में मैं, यानी कि नकारात्मकता की शक्ति, या निरा यथार्थता है, जो इनके [निश्चित सोच के] मौजूद होने के मूलतत्व और माध्यम हैं; जब कि ऐंद्रिक निर्धारण में सिर्फ शक्तिहीन, महज़[85] अमध्यस्थता, या केवल मौजूदगी है। सोच प्रवाही बन जाते हैं, जब निरा चिंतन, यानी कि यह अंदरूनी अमध्यस्थता, खुद को एक पहलू के रूप में पहचानता है, या जब निरा आत्मनिश्चितता खुद से बिछुड़ता है; -- ना खुद को छोड़कर या खुद को अलग रख कर, बल्कि अपनी स्वनिर्माण की अनम्यता को [दो तरह से] त्याग कर – [एक] निरा स्थूलता का अनम्यता जो कि विभेदित वस्तु के विपरीत मैं है; और [दो] निरा चिंतन के माध्यम में जो विभेदन के अनम्यता निर्मित हैं, और जो इस मैं के शर्तहीनता के साझेदार हैं। इस संचालन के ज़रिए निरा सोच अवधारणाएं बन जाते हैं, और सिर्फ अब ही ये अपनी असलियत में आते हैं: स्वचालन, वृत्त, जो इनका मूलतत्व, चित्तीय सारत्व[86] है।
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निरा सारवस्तु का यह संचलन समग्र रूप से वैज्ञानिकता की प्रकृति का गठन करता है। संचलन, जो उनके [निरा सारवस्तु के] विषय का पारस्परिक संबंध माना जाता है, वह विषय की [अंदरूनी] अनिवार्यता और उसकी जैविक पूर्णता का विकसन है। इस संचलन के ज़रिए, जिस पथ से ज्ञान की अवधारणा तक पहुंचा जाता है, वह पथ इसी तरह एक ज़रूरी और सम्पूर्ण बनना बनता है। और, इस तरह से, यह उपक्रम एक बेतरतीब दार्शनिक प्रक्रिया नहीं रहता है, जो कोई भी बेतरतीब वस्तु, संबंध, और अधूरे चेतना की सोच से (जो आकस्मिक रूप से घटित होते हैं) यूं ही जुड़ जाए; या निर्धारित सोच के अनुमान और निष्कर्ष के आधार पर पक्ष-विपक्ष बहस करके सच्चाई को स्थापित करे। इसके बजाय यह पथ अवधारणा के संचलन के ज़रिए, चेतना की समग्र लौकिकता को (उसकी निर्धारितता के साथ) पूरी तरह से अपने में समेट लेता है।
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इससे परे, इस प्रकार का प्रतिपादन विज्ञान का शुरुआती पहलू है, क्यों कि शुरू में चित्त की मौजूदगी अमध्यस्थता या प्रारंभिकता के अलावा कुछ नहीं है; लेकिन इस प्रारंभिकता का अब तक अपने आप में पुनरागमन नहीं हुआ है। इस लिए अमध्यस्थ मौजूदगी का यह अंश वह निर्धारितता है जो विज्ञान के इस अंश को दूसरे अंशों से भिन्न करता है।–इस भिन्नता का उल्लेख हमें इस संदर्भ में अक्सर उभरने वाले कुछ निर्धारित सोच की तरफ ले जाता है।
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चित्त की अमध्यस्थ मौजूदगी,यानी कि चेतना के दो पहलू हैं: जानना और वस्तूपरकता[87] जो जानने का विपरीत होता है। क्योंकि चेतना वह माध्यम है जिसमें चित्त अपने आप को विकसित करता है, और अपने पहलुओं को दर्शाता है, यह विरोधात्मकता इन पहलुओं से संबंधित है, और ये सारे [पहलु] चेतना के आकारों के रूप में उभरके आते हैं। इस सफर का विज्ञान उस अनुभव का विज्ञान है जिस से चेतना गुज़रती है; [इस प्रक्रिया में] मूलतत्व पर वहीं तक गौर किया जाता है जहां तक कि वह और उसकी हरकत चेतना के विषयवस्तु होते हैं। चेतना अपने अनुभव में जो है उसके अलावा और कुछ नहीं जानती या समझती है; क्योंकि उसके अनुभव में जो है, वह सिर्फ चित्तीय मूलतत्व है, और वास्तव में आत्म का विषयवस्तु है। लेकिन चित्त विषयवस्तु बनता है क्योंकि यह अपने से अन्य होने की हरकत है, यानी कि, आत्म का विषयवस्तु बनना और इस अन्यता का उदात्तीकरण करना। इसी हरकत को अनुभव का नाम दिया जाता है, जिसमें सन्निहित, जिसका अनुभव नहीं किया गया है, यानी कि अमूर्त (चाहे ऐंद्रिय मौजूदगी की अमूर्तता का या निरा साधारण सोच का ) अपने से बिछुड़ता है, और फिर इस बिछडेपन से स्वयं पर लौटता है, और पहली बार यह अपने यथार्थता और सत्य में प्रकट होता है, और यह चेतना का गुण-संपत्ति भी है।
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चेतना में मैं और मूलतत्व (जो उसका विषय वस्तु है) के बीच जो विषमता उभरता है, वह इन दोनों की पृथकता है, व्यापक अर्थ में नकार है। यह नकार दोनों की कमी मानी जा सकती है, लेकिन यह उनकी आत्मा है, या यह वह है जो उनको चालित करता है; इसी लिये कई [यूनानी] प्राचीन दार्शनिकों ने शून्य को चालक माना है, क्योंकि उन्होंने यह समझ लिया था कि नकार ही चालक है, हालाँकि उन्होंने यह नहीं समझा था कि नकार ही आत्म है। अब, अगर शुरू में यह नकार मैं और विषयवस्तु के बीच विषमता जैसा लगता है, वह उतनी ही मूलतत्व की अपने ही साथ विषमता है। मूलतत्व के बाहर जो हरकत होती हुई लगती है, वह हरकत जो ख़ुद के विपरीत चालित होती हुई लगती है, वह उसी [मूलतत्त्व] का किया कराया है, और मूलतत्व सारतः व्यक्ति/कर्ता के रूप में प्रकट होता है। और जब यह पूरी तरह से अपने को दर्शाता है, तब चित्त की अपनी मौजूदगी उसके सार के समान हो जाता है; वह ठीक इसी तरह से स्वयं का विषयवस्तु बन जाता है; और सन्निहितता का अमूर्त माध्यम, और ज्ञान और सत्य का विभाजन, अतिक्रमित हो जाते हैं। अस्तित्व पूर्णतः मध्यस्थ है; यह ठोस विषयवस्तु है जो साथ ही साथ अमध्यस्थ रूप में मैं का गुण-स्वभाव/संपत्ति है। वह ख़ुद-नुमा[88] या अवधारणा है। इसके साथ चित्त का परिघटनाशास्त्र संपूर्ण होता है। इस प्रक्रिया से चित्त जो अपने लिए तैयार करता है, वह ज्ञान का माध्यम है। इस माध्यम में चित्त के विभिन्न पहलू अब सादगी के रूप में फैल जाते हैं, जो [चित्त का यह रूप] यह पहचानता है कि वह स्वयं ही अपना विषयवस्तु है। मौजूदगी और ज्ञान के वैपरीत्य में ये [चित्त के पहलू] अब विभाजित नहीं होते, मगर ज्ञान के [एकत्व] सादगी में बसते हैं; वे सच के रूप में सच हैं, और उनकी विविधता महज़ विषयवस्तु की विविधता है। उनकी हरकत (जो इस माध्यम में अपने आप को संपूर्णता के रूप में संयोजित करता है) तर्क या तार्किक-वैचारिक[89] दर्शन है।
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अब, क्योंकि चित्त के अनुभव की प्रणाली का वास्ता सिर्फ चित्त के आभास/प्रतीति[90] के साथ है, इस प्रणाली से आगे सच के रूप में सच के विज्ञान की तरफ बढ़ना सिर्फ नकार की तरह लगता है, और [इस लिए] कोई भी यह चाहेगा कि नकार (जहां तक कि वह झूठ है) से बचे, और यह मांग करेगा कि बिना किसी झमेले के उसे सच की तरफ ले जाया जाए; झूठ पर ज़हमत क्यों उठाया जाए? – हमें सीधे सीधे विज्ञान से शुरू करना चाहिए – इस दृष्टिकोण की हमने पहले ही चर्चा की है। इसके जवाब में हमें नकार (जिसे आम तौर पर झूठ माना जाता है) की प्रकृति के सवाल पर गौर करना चाहिए। इस सवाल से संबंधित सामान्य विचार[91] खास करके सत्य के पथ में अवरोध पैदा करते हैं। इस संदर्भ में हमें गणितीय संज्ञान के बारे में बात करने का अवसर मिलेगा, जिसे गैर-दार्शनिक ज्ञान फलसफे का आदर्श मानता है, और यह मानता है कि उसे उपलब्ध करने के लिए फलसफे को कोशिश करनी चाहिए, हालाँकि अब तक यह कोशिश नाकाम रही है।
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सही और गलत उन निर्धारित सोच के अंश हैं जो स्थिर और अपने आप में सार माने जाते हैं; एक, एक तरफ और दूसरी परली तरफ, दोनों स्थिर और आपस में किसी समानता के बिना अलग-अलग खड़े। इस विचार के खिलाफ यह आग्रह करना चाहिए कि सत्य कोई ढाला हुआ सिक्का नहीं है, जो दिए जाने के लिए तैयार हो और यूं ही जेब में डाल लिया जाए। जैसे कोई बुराई नहीं है, उतना ही कोई गलत भी नहीं है। बुराई और गलत यकीनन शैतान जैसे खराब नहीं हैं, क्योंकि शैतानीयत में उन्हें खास व्यक्तिगत रूप भी दिया जाता है; गलत और बुराई के रूप में वे सिर्फ सार्वभौमिक हैं, हालांकि एक दूसरे के विपरीत दोनों की अपनी निश्चित प्रकृति होती है। गलत (क्योंकि हम यहाँ इसी की बात कर रहे हैं) मूलतत्व का अन्य[92], उसका नकार है, जब कि मूलतत्व, ज्ञान के विषय-वस्तु के रूप में, सही है। लेकिन मूलतत्व खुद भी दर असल नकार है, कुछ हद तक विषय-वस्तु का पृथक्करण और निर्धारण है, और कुछ हद तक निरा विभाजन की प्रक्रिया है, यानी कि आत्म और व्यापक रूप से ज्ञान का विभाजन है। बेशक किसी का ज्ञान गलत हो सकता है। अगर कोई चीज़ गलत रूप से जाना जाता है, इसका अर्थ यह है कि ज्ञान और मूलतत्व के बीच विषमता है। लेकिन दर असल यह विषमता व्यापक रूप में विभाजन की प्रक्रिया है, जो [ज्ञान का] एक अनिवार्य पहलू है। यकीनन, इस विभाजन की प्रक्रिया से उनकी समानता उभरके आती है, और यह उभरती हुई समानता ही सत्य है। लेकिन यह ऐसा सत्य नहीं है जिस में से विषमता को निकाल दिया गया हो, जैसे शुद्ध धातु से अशुद्धियाँ निकाली जाती हैं, और उस औज़ार की तरह कतई नहीं है जो पूरी तरह से निर्मित बर्तन से अलग रह जाता है; वस्तुतः, सच में विषमता फिर भी नकार और स्वयं के रूप में मौजूद रहता है। अलबत्ता, इसका मतलब हम यह नहीं कह सकते हैं कि गलत सच का एक पहलू है, या किसी तरह से भी उसका हिस्सा है। ‘हर मिथ्या में कुछ सच होता है’, इस कहावत में सत्य और मिथ्या पानी और तेल के समान माना गया है, जिनका घुलना संभव नहीं है, और उनका केवल बाहरी संमिश्रण होता है। ठीक इसी लिए हम सम्पूर्ण अन्यता के पहलू को चिन्हित करना चाहते हैं, जब उनकी [सच और गलत की] अन्यता का उदात्तीकरण हो जाता है, हमें “गलत” और “सच” शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसी तरह, व्यक्ति/कर्ता और विषय-वस्तु, सीमित और असीम, मौजूदगी और सोचने, आदि की चर्चा में यह कमी है कि विषय-वस्तु और व्यक्ति/कर्ता आदि उनकी एकात्मकता के बाहर जो हैं, उन्हें व्यक्त करते हैं, और इस लिए उनकी एकात्मकता में इन शब्दों के जो अर्थ सूचित होते हैं, वो अभिप्रेत नहीं हैं; इसी तरह, गलत, गलत के रूप में, अब सत्य का पहलू नहीं रहता है।
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ज्ञान में सोचने का तरीका, और फलसफे के अध्ययन में, यह मत कि सच किसी प्रस्ताव में होता है जो कि एक स्थिर नतीजा है, या जिसे स्वतः जाना जाता है, यह दृढ़ोक्ति[93] के अलावा कुछ नहीं है। ऐसे सवाल – सीज़र कब पैदा हुए थे, या कौनसे स्टेडियम में कितने गज़ होते हैं, आदि – स्पष्ट जवाब देना चाहिए; जैसे, यह बिल्कुल सच है कि समकोण त्रिभुज में कर्ण का वर्ग अन्य दो भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है। लेकिन ऐसे तथाकथित सत्य की प्रकृति फलसफे के सत्य की प्रकृति से अलग है।
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जहां तक ऐतिहासिक सत्य के सवाल हैं (संक्षेप में कहा जाए तो), उनके निरे ऐतिहासिक पहलू को देखा जाए तो, बिना किसी हिचकिचाहट के मान लिया जाता है कि उनका संबंध विशिष्ट मौजूद-होने से है, [यानी कि] किसी विषय-वस्तु का संयोगवश और इत्तेफाकन पहलू से है जिनकी निर्धारितता अनिवार्य नहीं हैं।–लेकिन दिए हुए उदाहरणों के सादे सच भी आत्म-सचेतनता की हरकत के बिना नहीं हैं। इन में से किसी एक को समझने के लिए काफी तुलना की ज़रूरत है, किताबें पढ़ना या किसी प्रकार के शोध की आवश्यकता है; अमध्यस्थ अंतर्दृष्टि के विषय में भी केवल अंतर्दृष्टि का ज्ञान और साथ साथ उसके आधार ही वास्तविक मूल्य माने जाते हैं, हालांकि हमारा वास्ता सिर्फ निरे परिणाम से है।
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गणितीय सत्यों के संदर्भ में भी, हमें किसी को ज्यामितिशास्त्री मानने की संभावना कम है, अगर उसने यूक्लिड के प्रमेयों को उनके प्रमाणों के जाने बिना सतही रूप से रटा हुआ हो, या (अगर हम इसकी वैपरीत्य को व्यक्त करें तो) उनकी अंदरूनी संरचना को नहीं समझा हो। इसी तरह, यह जानकारी—समकोण त्रिभुजों की भुजाओं के बीच जाना-पहचाना संबंध है—असंतोषजनक माना जाएगा, अगर किसी ने ढेर सारे समकोण त्रिभुजों को नाप कर [यह जानकारी] प्राप्त किया हो। बहर हाल, गणितीय संज्ञान में भी प्रमाण की अनिवार्यता को अब तक [इस स्तर पर] परिणाम के पहलू होने के महत्व और प्रकृति नहीं प्राप्त होता है; परिणाम में प्रमाण अतीत और लुप्त हो जाता है। क्योंकि यह परिणाम है, निस्संदेह यह प्रमेय सच्चा प्रमेय माना जाता है। लेकिन यह अतिरिक्त परिस्थिति [प्रमेय को सच्चा प्रमेय मानना] से विषय-वस्तु पर कोई असर नहीं होता है, सिर्फ व्यक्ति/कर्ता [और प्रमेय] के संबंध पर असर होता है; उसका [गणितीय प्रमाण का] संचलन विषय-वस्तु का हिस्सा नहीं होता है; यह प्रक्रिया प्रस्तुत मुद्दे[94] के बाहर घटित होती है। इस लिए, समकोण त्रिभुज की प्रकृति अपने आप में ठीक उस तरह से विभाजित नहीं होती है, जिस तरह से उसके संबंधों को व्यक्त करती हुई प्रस्तावना के प्रमाण के लिए आवश्यक संरचना में [विभाजन] प्रस्तुत किया जाता है; संज्ञान की प्रक्रिया और साधन से परिणाम का पूरा निर्माण होता है। इसके अलावा दार्शनिक संज्ञान में [सुप्त] मौजूदगी का [विकसित] मौजूदगी बनना, [प्रस्तुत] मुद्दे का सार या अंदरूनी प्रकृति बनने की प्रक्रिया से अलग होती है। लेकिन पहली बात यह है कि दार्शनिक संज्ञान में दोनों शामिल होते हैं, जबकि गणितीय संज्ञान केवल [सुप्त] मौजूदगी के बनने [विकसित होने] को प्रस्तुत करता है, यानी कि संज्ञान में मुद्दे के प्रकृति की मौजूदगी के विकसित होने को प्रस्तुत करता है। दूसरी बात, दार्शनिक संज्ञान इन दोनों विशेष संचालनों को भी एकीकृत करता है। मूलतत्व का अंदरूनी उद्भव या विकसित होना, बाह्यता या मौजूद होने की तरफ अनर्गल गमन है, दूसरे-के-लिए-होना[95] है, और इसके विपरीत [सुप्त] मौजूदगी का विकसित होना सार में वापस सिमट जाना भी है। यह हरकत एक दुहरी प्रक्रिया और सम्पूर्ण बनना है, ताकि दोनों एक ही साथ एक दूसरे को प्रस्थापित करते हैं, और इस लिए प्रत्येक पक्ष में दोनों पहलू समाहित होते हैं; अपने आप को विलीन करके, और संपूर्णता के पहलू बनकर, दोनों एक साथ उस संपूर्णता का निर्माण करते हैं।
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गणितीय संज्ञान में विषय-वस्तु के लिए, अंतर्दृष्टि एक बाह्य कार्यकलाप है; इसका नतीजा यह है कि इस [कार्यकलाप] से विषय-वस्तु की सच्चाई की तबदिली हो जाती है। तो जब कि साधन – यानी कि [ज्यामितिक] गठन और प्रमाण – में बेशक सही प्रस्ताव होते हैं, यह भी कहना चाहिए कि इसका विषय-वस्तु बनावटी है। ऊपर वाले उदाहरण में त्रिकोण को विखंडित किया जाता है और उसके अंगों को दूसरे आकृतियों—जो इस गठन से उत्पन्न होते हैं—पर डाला जाता है। सिर्फ अंत में ही त्रिकोण का पुनःनिर्माण होता है, जिस त्रिकोण से हम असल में संबंधित हैं, और जो इस प्रक्रिया के दौरान ओझल हो गया था, और जो दूसरे आकृतियों के अंश बनके उभर आए थे। तो हम यहाँ विषय-वस्तु की नकारात्मकता को भी उभरते हुए देखते हैं; इस विषय-वस्तु की नकारात्मकता को उतना ही आवास्तव कहा जाना चाहिए, जैसा कि अवधारणा की हरकत में तथाकथित स्थिर विचार मिट जाने पर उन्हें अवास्तव कहना जाएज़ है।
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लेकिन इस संज्ञान की कमी, इसी संज्ञान और साथ साथ उसकी विषय-वस्तु से संबंधित है।–जहां तक संज्ञान का सवाल है हम, फिलहाल, गठन की आवश्यकता को नहीं देख पाते हैं। यह प्रमेय की अवधारणा से उभरके नहीं आता है; वास्तव में यह थोपा गया है, और इन्ही रेखाओं को चित्रित करने की आज्ञा (जब कि कई अनेक अन्य रेखाएं चित्रित की जा सकती थीं) को आँख मूँद कर पालन करना चाहिए—यह भोला विश्वास (इसके आगे और कुछ जाने बिना) रखना चाहिए कि प्रमाण के निष्पादन के लिए यह काफी होगा। अंत में यह उद्देश्यपूर्णता भी प्रकट होता है, और इसी वजह से यह केवल एक बाह्य उद्देश्यपूर्णता है, क्योंकि यह प्रमाण की प्रक्रिया के बाद ही प्रकट होता है। इसी तरह, प्रमाण भी एक राह पर चलता है, जो ऐसी जगह शुरू होता है जिसका प्रत्याशित परिणाम के साथ कोई संबंध नहीं होता है। आगे बढ़ते हुए एक [तार्किक] आवश्यकता के अनुसार (जो हम तुरंत नहीं समझ पाते हैं) यह इन निरूपण और संबंधों पर ध्यान देता है, और दूसरे निरूपण और संबंधों को परे रखता है; यह हरकत एक बाह्य उद्देश्य से संचालित होता है।
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इस त्रुटिपूर्ण संज्ञान के स्वतः-प्रमाण पर गणित गर्वित है, फलसफे के सामने भी बखान करता है, लेकिन यह [स्वतः-प्रमाण] पूरी तरह से उसके उद्देश्य का दैन्य और उसके उपकरण की त्रुटिपूर्णता पर आधारित है, और इस लिए फलसफे को इसकी [स्वतः-प्रमाण की] अवज्ञा करनी चाहिए।–परिमाण गणित का उद्देश्य और अवधारणा है। यही संबंध अनावश्यक और अप्रत्ययात्मक है। इस तरह से, जानने का सिलसिला सतह पर चलता है; प्रमुख मुद्दे (यानी कि सार या अवधारणा) को नहीं छूता है, और इस वजह से यह [गणित] अवधारणापूर्ण बोध नहीं है। स्थानिक-विस्तार[96] और इकाई वो चीजें हैं, जिनके बारे में गणित सत्यों का ‘संतोषजनक’ खज़ाना पेश करता है। स्थानिक-विस्तार वह मौजूदगी है जिसमें अवधारणा अपनी विशिष्टताओं को चित्रित करती है, जैसे कि वह (स्थानिक-विस्तार) एक रिक्त निष्प्राण वस्तु हो, जिसमें वे (विशिष्टताएं) उतने ही अचल और निर्जीव हैं। वास्तविक स्थानिक नहीं होता है, जैसा कि इसे गणित में माना जाता है; न ठोस ऐंद्रिय अनुभव और न ही फलसफा ऐसी अयथार्थता से संबंधित है, जैसे गणित की वस्तुएं होती हैं। आखिर ऐसे अवास्तविक माध्यम में सिर्फ अवास्तविक सत्य होता है, यानी कि अनम्य, निष्प्राण प्रस्ताव; हम किसी भी प्रस्ताव पर रुक सकते हैं; अगला प्रस्ताव नए सिरे से शुरू होता है, पहले प्रस्ताव का दूसरे तक बढ़े बिना, और प्रमुख मुद्दे के प्रकृति से उभरते [तार्किक] जरूरी [आपसी] संबंध के बिना। ईसके अलावा इस सिद्धांत और माध्यम की वजह से—और यहीं गणितीय स्वतः-प्रमाण और औपचारिकता निहित है—ज्ञान समानता के लकीर पर चलता है। जो मृत है, क्योंकि वह अपने आप को चालित नहीं करता है, वह सार की विशिष्टताओं तक नहीं पहुंचता है, न मूलभूत वैपरीत्य या असमानता तक, फलतः न ही वैपरीत्य का [उसके] वैपरीत्य पर संक्रमण तक; यह गुणात्मक, अंतर्निहित गतिविधि, या [जैव] स्वचालन तक नहीं पहुंचता है।–ऐसा इस लिए है कि गणित सिर्फ परिमाण, यानी कि अनावश्यक विशिष्टता पर गौर करता है। गणित इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करता है कि अवधारणा ही स्थानिक-विस्तार को अपने आयामों में विभाजित करता है और इनके अपने और आपस के संबंधों को निश्चित करता है; मसलन, लकीर और सतह के संबंध को नहीं जाँचता है; और जब वह वृत के व्यास और परिधि की तुलना करता है, वह इनकी अतुलनीयता से टकराता है, यानी कि अवधारणा का एक ऐसा संबंध, एक असीम जो गणितीय निर्धारण से छूट जाता है।
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इसके अलावा अंतर्निहित, या तथाकथित सैद्धांतिक गणित समय को, समय और स्थानिक-विस्तार के सह-संयोजन में नहीं देखता है, और उसे अपने तर्क का दूसरा उपादान नहीं मानता है। प्रयुक्त गणित, समय, और साथ साथ गति, और दूसरे वास्तविक मामलों से बेशक निपटता है; लेकिन यह संश्लेषणात्मक प्रस्तावों पर विचार करता है, यानी कि उनके संबंधों से जुड़े हुए प्रस्ताव, जो उनकी अवधारणा से निर्धारित हैं। यह इन संश्लेषणात्मक प्रस्तावों को अनुभव से लेता है, और बस इन पूर्वधारणाओं पर अपने सूत्रों को लागू करता है। प्रयुक्त गणित अक्सर प्रस्तावों के तथाकथित प्रमाण देता है, जैसे लीवर का संतूलन, या गिरने के गति में स्थानिक-विस्तार और समय के बीच संबंध, इत्यादि; लेकिन बात यह है कि इनका प्रस्तुत करना और प्रमाण के रूप में स्वीकार करना ही सिद्ध करता है कि संज्ञान के लिए प्रमाण कितना महत्वपूर्ण है, क्योंकि, जहां और कुछ भी नहीं है, वहाँ संज्ञान प्रमाण के खोखले दिखावे को दर्ज़ा देता है, और उस से थोड़ी संतुष्टि प्राप्त करता है। इन प्रमाणों की समीक्षा ध्यान देने लायक और शिक्षाप्रद होगा; यह गणित को इस फ़र्ज़ी सजावट से परिष्कृत करेगा और साथ ही साथ इसकी सीमा को दिखाएगा, और लिहाज़ा एक दूसरे किस्म के ज्ञान की ज़रूरत को दर्शाएगा।–जहां तक कि समय का सवाल है यह माना जा सकता है कि यह स्थानिक-विस्तार का समकक्ष होगा, जो सैद्धांतिक गणित की दूसरी उपादान का निर्माण करेगा; लेकिन, वह (समय) अवधारणा ही है, जो मौजूद है। विस्तार का सिद्धांत, अवैचारिक असमानता, और समानता का सिद्धांत, अमूर्त निर्जीव एकरूपता; ये जीवन और संपूर्ण विशिष्टीकरण की मौलिक बेचैनी से निपट नहीं सकते हैं। अतः यह नकारात्मकता निर्जीव अचल रूप में, यानी कि एक एकाई के रूप में, गणीतिक संज्ञान का दूसरा उपादान बन जाता है, जो कि एक बाह्य कार्य-प्रणाली के तहत, स्वचालित को उपादान में परिवर्तित करता है, ताकि उसमें अब एक निष्क्रिय, बाह्य, निर्जीव विषय-वस्तु प्राप्त हो।
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फलसफा, इसके विपरीत, ग़ैर-ज़रूरी निर्धारण पर गौर नहीं करता है, बल्कि उसी निर्धारण पर ध्यान देता है, जहां तक कि वह ज़रूरी है; उसका माध्यम और विषय-वस्तु अमूर्त या अवास्तव नहीं है, बल्कि वास्तव है, जो अपने को स्थापित करता है और अपने आप में बसता है—अपनी अवधारणा में मौजूद होता है। यह वह प्रक्रिया है जो अपनी पहलुओं[97] का निर्माण करके उन में से गुज़रता है, और यह पूरी गतिविधि सकारात्मकता और सत्य का निर्माण करती है। अतः, इस सत्य में नकारात्मकता भी शामिल है (जिसे गलत कहा जाता है) अगर यह मान लिया जाए कि इस [नकारात्मकता] से कुछ निष्कर्ष निकालना चाहिए। इसके विपरीत, जो क्षणभंगुर होता है, उसे सार मानना चाहिए, एक स्थिर-वस्तु के निर्धारितता में नहीं जो सत्य से अलग करके बाहर कहीं ना कहीं छोड़ दिया जाता है, और दूसरी तरफ वैसे ही एक सत्य को निर्जीव, स्थिर सकारात्मकता के रूप में नहीं मानना चाहिए। प्रतीति वह उगना और गुज़रना है, जो खुद उगता या गुज़रता नहीं है, लेकिन स्वयं में है और जैविक सत्य की यथार्थता और गतिविधि का गठन करता है। इस प्रकार, सच एक बक्खनाली[98] आवेश है, जिसमें कोई भी भागी होश में नहीं होता है, और चूंकि हर भागी [अंश] अलग होते ही तुरंत घुल जाता है, यह आवेश पारदर्शी और सरल प्रशांति भी है। उस गतिविधि के अदालत में, बेशक चित्त के कोई एकल रूप ठहरते नहीं हैं, ठीक जैसे कि निर्धारणात्मक विचार नहीं ठहरते हैं; लेकिन वे उतने ही सकारात्मक और जरूरी आघूर्ण [पहलू] भी हैं, जितने वे नकारात्मक और क्षणभंगुर हैं। इस गतिविधि की संपूर्णता में, जिसे प्रशांति के रूप में कल्पित किया गया है, इस गतिविधि में स्वयं अपने आप को अलग करता है और एक खास मौजूदगी देता है, अब यह वह है जो स्वयं के स्मरण/समेकित रूप में संरक्षित है, जिसकी मौजूदगी स्वयं के ज्ञान में है, जब कि यह स्व-ज्ञान उतनी ही सन्निहित मौजूदगी है।
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इस विज्ञान या गतिविधि की पद्धति की मुख्य विशेषताओं को शायद पहले से ही बता देना ज़रूरी होगा। लेकिन इसकी अवधारणा पहले से ही हमने जो बताया उसमें शामिल है, और इसकी सही व्याख्या केवल तर्क का अंग नहीं है, बल्कि तर्क ही है। क्योंकि यह पद्धति सम्पूर्ण की संरचना का निरा अनिवार्यता के अलावा कुछ नहीं है। लेकिन इस मामले [फलसफे की पद्धति] के बारे में अब तक प्रचलित कुछ दृष्टिकोण हैं; इस संदर्भ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दार्शनिक पद्धति की प्रकृति से जुड़े हुए विचार प्रणाली भी एक विलुप्त संस्कृति का अंग है। अगर यह गर्वोक्ति या क्रांतिकारी बयान जैसा लगे, यह अंदाज मेरे मकसद से काफी दूर है; हमें याद रखना चाहिए कि गणित जो वैज्ञानिक अलंकार प्रस्तुत करता है – उसके व्याख्या, वर्गीकरण, स्वयंसिद्ध सत्य, प्रमेयों के अनुक्रम, उनके प्रमाण, सिद्धांत और उनसे उत्पन्न नतीजे और निष्कर्ष के साथ – वह आम सोच में कम से कम अब तक पुराना हो चुका है। भले ही उसकी अयोग्यता स्पष्ट ना दिखती हो, उसका अब ना के बराबर इस्तेमाल किया जाता है, और अगर लोग इसे सरासर नामंज़ूर ना करते हों, वे इसे पसंद भी नहीं करते हैं। और हमें उत्कृष्टता की तरफ सकारात्मक मनोभाव को बनाए रखना चाहिए, क्योंकि यह अपने लिए उपयोग ढूंढ लेती है और लोकप्रिय हो जाती है। और यह समझना मुश्किल नहीं है कि एक प्रस्ताव के पेश करने का अंदाज़ (उसके समर्थन में दलील उपस्थित करना, और इसी तरह, विपरीत प्रस्ताव का दलीलों से खंडन करना) सत्य के उभरने का रूप नहीं हो सकता है। सत्य अपने आप में एक अंदरूनी गतिविधि है, जबकि उपर्युक्त तरीका ऐसा संज्ञान है जो विषय-वस्तु के बाहर है। इसी लिए यह प्रक्रिया गणित की विशिष्टता है, और उसे गणित पर ही छोड़ देना चाहिए, क्योंकि हमने देखा है कि इसका सिद्धांत परिमाण का अप्रत्ययात्मक संबंध पर आधारित है, और मृत स्थानिक-विस्तार, और उतना ही मृत मात्रक उसकी सामग्री है। यह पद्धति, इस से भी ज्यादा अनुशासनहीन शैली में (यानी कि अधिक विशृंखला और आकस्मिकता से मिश्रित) आम ज़िंदगी में रह सकता है, बात-चीत में, या ऐतिहासिक शिक्षण में, जो संज्ञान से ज्यादा कौतुहल के लिए किया जाता है, करीब-करीब एक भूमिका जैसे भी। आम ज़िंदगी में सचेतनता का विषय वस्तु है—सूचना, अनुभव, ऐंद्रिक संघनन, सोच और सिद्धांत भी। यानी कि यह [विषय-वस्तु] आम तौर पर जो भी उपलब्ध दिखता है, या एक स्थिर और स्थायी मौजूदगी*,* या सार है। कभी कभी सचेतनता इसके बनाए हुए पथ पर चलती है, कभी कभी यह अबाध मनमानी से इस विषयवस्तु के संबद्धता को तोड़ती है और एक बाह्य निर्धारक के रूप में विषयवस्तु का संचालन करती है। यह विषयवस्तु को किसी न किसी निश्चितता में खोजती है, भले ही वह कोई सामयिक अनुभूति क्यों ना हो; और एक जाने पहचाने ठहराव पर पहुँचने पर इसकी आस्था को सुकून मिलता है।
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लेकिन अगर अवधारणा की अनिवार्यता संकीर्ण तर्कसंगत बातचीत की ढीली चाल का, और वैज्ञानिक आडंबर की कड़ी चाल का निष्कासन करती है, हमने पहले ही जैसे बताया है कि इनकी जगह पूर्वाभाव या प्रेरणा से नहीं भरी जानी चाहिए, और ना ही दिव्य कथन की मानमानापन से, जो उस [गणितीय] प्रकार के शास्त्र की तरफ ही नहीं बल्कि व्यापक रूप में वैज्ञानिक पद्धति की तरफ भी नफरत से देखती है।
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कांट ने त्रिविधता का पुनराविष्कार किया, हालाँकि यह उन्हें सहज बुद्धि से प्राप्त हुआ। वह उनके हाथ में अब तक बेजान और अनवधारित था; अब वह सम्पूर्ण अर्थ के दर्ज़े तक पहुंचाया गया है, ताकि उसका खरा रूप साथ ही साथ खरे विषयवस्तु में प्रस्तुत किया गया, और विज्ञान की अवधारणा का उद्भव हुआ। फिर भी हम कभी कभी देखते हैं कि इस रूप का इस्तेमाल ऐसे किया जाता है कि वह एक निर्जीव ढांचे, एक आभास मात्र, पर उतर आता है; वैज्ञानिक संरचना को एक नक्शे के स्तर पर ले आता है; हमें ऐसा नहीं समझना चाहिए की इस इस्तेमाल का भी[99] विज्ञान के साथ कोई वास्ता है। यह रीतिवाद (जिसका ज़िक्र हम सामान्य रूप से कर चुके हैं, और जिसकी शैली को हम और विस्तारित रूप से यहाँ निर्दिष्ट करना चाहते हैं) मान के चलता है कि जब वह एक ढांचे में किसी रूप को एक विशेषण के रूप में निर्दिष्ट करता है, उसने उस रूप के प्रकृति और नब्ज़ को समझ लिया है और उसे व्यक्त किया है; यह [विशेषण] व्यक्तिपरकता और वस्तुनिष्ठता हो सकता है, या फिर चुम्बकत्व, बिजली आदि, संकुचन या विस्तार, पूरब या पश्चिम, इत्यादि। इसे अनंत तक दोहराया जा सकता है, क्योंकि इस तरह से हर एक निर्धारितता या रूप को ढांचे के किसी रूप या पहलू के लिए फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है, और हर रूप, एक दूसरे के लिए कृतज्ञतापूर्वक यह सेवा कर सकता है—यह पारस्परिकता का एक वृत्त बन जाता है, जिसके ज़रिए मूल विषय क्या है, कोई उसका अनुभव नहीं करता है, ना तो एक [निर्धारितता] क्या है, और ना ही दूसरा क्या है। यहाँ कभी कभी ऐंद्रिय निर्धारितताओं को साधारण अनुभूति से लिया जाता है, और यह मान ही लिया जाता है कि उनका अर्थ उनके कथन से अलग है; ऐसी पद्धति में कभी कभी ऐंद्रिय निर्धारितताएं सामान्य प्रत्यक्षता से उठाये जाते हैं, और यकीनन, यह मान लिया जाता है कि उनका अर्थ उनके कथन से अलग है; कभी कभी जो अपने आप में अर्थपूर्ण है, सोच की निरी निर्धारितताओं (जैसे कि व्यक्ति/कर्ता, वस्तु, मूलतत्व, कारण, सार्वभौमिकता आदि) का उपयोग वैसे ही अंधाधुंध और विचारहीन तरीके से किया जाता है, जैसे कि वह साधारण जीवन में होते हैं; ठीक उसी तरह जैसे मज़बूतियाँ और कमियाँ, विस्तार और संकुचन का उपयोग [आम तौर पर] किया जाता है; इस लिए यह तत्वमीमांसा[100] उतना ही अवैज्ञानिक है जितने ये ऐंद्रिय अभिवेदन[101] होते हैं।
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अंदरूनी जीवन और उसके मौजूदगी के स्वचालन के बजाय, प्रत्यक्षता की ऐसी सरल निर्धारितता (यानी कि यहाँ ऐंद्रिय ज्ञान)—अब एक सतही सादृश्यता के तहत व्यक्त किया गया है, और ऐसे सूत्र के बाहरी और खोखले अनुप्रयोग को व्याख्या[102] [सिद्धांत] का नाम दिया गया है। इस प्रकार का रीतिवाद किसी भी दूसरे रीतिवाद के समान है। ऐसा कौन बेवकूफ होगा, जिसे पंद्रह मिनिट में यह सिद्धांत नहीं सिखाया जा सकता है कि क्षीण[103], तीव्र और परोक्षतः क्षीण बीमारियाँ होती हैं, और उनके उतने ही प्रकार के इलाज होते हैं; और ऐसा कौन नहीं होगा जो आशा करता हो (क्योंकि हाल ही तक ऐसे लक्ष्य के लिए इस तरह की सीख काफी होती थी) कि इतने कम समय में वह एक घरेलू डाक्टर से सैद्धांतिक चिकित्सक के स्तर पर पहुँच जाएगा? जब प्रकृति के दर्शन का रीतिवाद यह सिखाता है कि, मसलन, बुद्धि बिजली है, या पशु नाइट्रोजन या फिर दक्षिण या उत्तर के बराबर है, इत्यादि; या उसे [बुद्धि, पशु, इत्यादि] एक परोक्षी से प्रस्तुत करता है, चाहे वह, यहाँ जैसे सपाट तरीके से कहा गया हो, या अधिक तकनीकी शब्दावली से गढ़ा हुआ हो—तब अनाड़ीपन ऐसी [रीतिवाद की] प्रबलता—([क] जो असंबद्ध लगने वाली चीज़ों को एक साथ समेटती है; और [ख] इस एकत्रीकरण से स्थिर ऐंद्रिकता के प्रति जो तीव्र बल प्रयोग होता है, ऐसा बल प्रयोग जिस से ऐंद्रिकता एक अवधारणा जैसा लगता है और असली मुद्दा टल जाता है)—के प्रति प्रशंसा और आश्चर्य की भावना से अभिभूत हो सकता है। हो सकता है कि अनाड़ीपान इन सब में निहित एक गहरी प्रतिभा को पूजे। और हो सकता है कि ऐसी निर्धारितताओं की चमक से वह खुश हो, क्योंकि ये अमूर्त अवधारणा के स्थान पर प्रत्यक्ष स्पष्टता को प्रस्तुत करते हैं और उसे ज़्यादा संतोषजनक बनाते हैं; और यह [अनाड़ीपन], इस [निर्धारितताओं के] शानदार प्रदर्शन के साथ आत्मीय नाता महसूस करने पर, शायद अपने आप को बधाई दे। इस तरह के ‘ज्ञान’ की पकड़ उतनी ही जल्दी सीखी जा सकती है, जितनी कि उस पर अमल करना; इसका दुहराव, जब घिसा पिटा सा होता है, वह उतना ही असह्य होता है जितना कोई जादू का दोहराना जिसकी चाल पहले से ही पकड़ी गई हो। इस उबाऊ रीतिवाद के उपकरण का प्रयोग करना किसी चित्रकार के ऐसे पैलेट से ज्यादा मुश्किल नहीं है जिसमें दो ही रंग हैं, लाल और हरा, लाल रंग ऐतिहासिक दृश्य के लिए, और हरा प्राकृतिक दृश्य के लिए इस्तेमाल होते हैं। यहाँ यह तय करना मुश्किल होगा कि क्या ज्यादा ‘महत्तर’ है: आसानी से स्वर्ग, भूलोक, और पाताल में सब कुछ इस रंग के घोल से लिपा जाना, या इस ‘सार्वभौमिक’ [घिसे-पिटे ] तरीके के उत्कृष्टता के प्रति खोखला घमंड: दोनों एक दूसरे की पुष्टि करते हैं। यह पद्धति सार्वभौमिक ढांचे के कुछ निर्धारितताओं को हर एक स्वर्गीय और भूलौकिक चीज़, सारे प्राकृतिक और आध्यात्मिक संरचनाओं पर थोपता है, और इस तरह से हर चीज का वर्गीकरण करता है। और यह जो उत्पन्न करता है, वह ब्रह्मांड के जैविकता पर दिन के उजाले के तरह स्पष्ट रपट से कोई कम नहीं है।-- यानी कि एक नक्शा जो एक कंकाल के तरह है, जिस पर छोटे-छोटे पर्चे चिपकाये गए हों, या मसाले के दुकान में बंद बक्सों की कतार पर चिप्पीयां लगायी गई हों। यह नक्शा उतना ही स्पष्ट है जितना कि ये [कंकाल या बक्से] हैं; और जैसे पहले मामले में हड्डियों से मांस और खून हटा दिया गया है, और दूसरे में निर्जीव विषय/वस्तु को डिब्बों में छिपा दी गई हैं, वैसे ही इस नक्शे में भी विषय/वस्तु का जीवंत सार या तो हटा दिया गया है या छिपा दिया गया है। — हम पहले ही कह चुके हैं कि इस तरीके के परिणाम स्वरूप साथ ही साथ एक एकरंगी, ‘परम’ चित्रकला बनती है: ढांचे के भेदों से परेशान हो कर, यह उन्हें (यह मानकर कि वो प्रतिबिंब के दायरे में आते हैं) एक शून्य निरपेक्षता में डुबो देता है, ताकि केवल निरी समरूपता, निराकार सफेद रंग उत्पन्न हो। इस प्रकार यह ढांचा और उसकी निर्जीव निर्धारितताओं का यह एकरस रंग, यह सम्पूर्ण समरूपता, और एक से दूसरे में संक्रमण — ये सभी बेजान समझ और बाहरी ज्ञान के समान हैं।
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उत्कृष्टता[104] अपने प्राण और आत्मा से वंचित किए जाने की नियति से नहीं बच सकती — उसे जैसे चमड़ी उतारकर निर्जीव ज्ञान और उसके ग़रूर पर चढ़ा दिया जाता है। लेकिन यह पूरी तस्वीर का बस एक हिस्सा है। इसी नियति में हम यह भी देख सकते हैं कि उत्कृष्टता दिलों पर (अगर दिमाग़ों पर नहीं) कितना असर डालती है, और यह भी देख सकते हैं कि किस तरह इसका रूप सार्वभौमिकता और निर्धारितता में विकसित होता है — वही रूप जिसमें इसकी सिद्धि निहित है, और यही इस सार्वभौमिकता को सतही ढंग से इस्तेमाल किए जाने को संभव बनाता है।विज्ञान को अवधारणा के अपने जीवन के अनुसार ही स्वयं को व्यवस्थित करना होता है; जो निर्धारितता [निर्जीव] ढांचे [या आभास मात्र] से ली जाती है और बाहरी रूप से मौजूदगी पर चिपकाई जाती है, वह [तार्किक-वैचारिक] विज्ञान में परिपूरित विषयवस्तु की स्वचालित आत्मा है। मौजूद अवधारणा की हरकत में शामिल है, एक तरफ अपने ही लिए अन्य बन जाना, और इस तरह अपना ही अंतर्निहित विषयवस्तु बन जाना; दूसरी तरफ, मौजूद अवधारणा का अपने इस विकसित होना या मौजूदगी को स्वयं में वापस समा लेना है — अर्थात् वह स्वयं को एक पहलू बना लेता है और अपने को एक निश्चितता में सरलीकृत करता है। इस पहले हरकत में, नकारात्मकता ही मौजूदगी का विशिष्टीकरण और उसका स्थापन है; और स्वयं में इस लौटने की प्रक्रिया में, वही नकारात्मकता निश्चित सरलता का बनना है। इस तरह विषयवस्तु यह दिखाता है कि उसकी निश्चितता किसी बाहरी तत्व से प्राप्त होकर उस पर थोपी नहीं गई है, बल्कि वह स्वयं ही अपने को निश्चितता देता है और सम्पूर्णता में एक पहलू के रूप में व्यवस्थित करता है।
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तालिकाबद्ध समझ अपने में ही विषयवस्तु की आवश्यकता और अवधारणा और वस्तु का ठोसपन, यथार्थता और मूल विषय की जीवित हरकत जो स्वयं-व्यवस्थित है, उन्हें अपने में सीमित रखती है; या वास्तव में, वह इसे अपने में रखती नहीं है बल्कि उसे तो इसकी जानकारी तक नहीं है; अगर उसे यह अंतरज्ञान होता, तो वह उसे ज़रूर दर्शाती। वह तो इस अंतर्ज्ञान की आवश्यकता को पहचानती भी नहीं; वरना वह अपने योजनाबद्ध सोच को त्याग देती, या कम से कम यह समझ लेती कि वह उसे बस विषय-सूची की तरह ही सेवा दे सकती है। समझ सिर्फ विषय-सूची ही देती है; असली विषयवस्तु को वह प्रस्तुत नहीं करती। यहाँ तक कि जब निश्चितता — जैसे कि चुम्बकत्व — अपने आप में ठोस या वास्तविक हो, तब उसे भी मरी हुई चीज़ बना दी जाती है, क्योंकि वह सिर्फ किसी और मौजूदगी का विधेय माना जाता है, न कि इस [अपनी] मौजूदगी में अंतर्निहित जीवन के रूप में जानी जाती है — ना ही इस मौजूदगी में उसकी आतंरिक और अनूठी स्वोत्पत्ति और प्रस्तुति के रूप में। औपचारिक समझ इस मूल विषय को [तालिकाबद्ध जानकारी के साथ] जोड़ने का काम दूसरों पर छोड़ देती है। समझ विषय के अंतर्निहित तत्व में प्रवेश करने के बजाय हमेशा पूर्ण को जांचती रहती है और उस एकल मौजूदगी जिसके बारे में वह बात करती है, उसके ऊपर स्थित रहती है—यानी कि वह उसे [आतंरिक तत्त्व] देखती ही नहीं। इसके विपरीत, वैज्ञानिक संज्ञान यह माँग करती है, कि विषय के जीवत्व में आत्मसमर्पण किया जाए, यानी कि, उसकी आंतरिक आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करके उसे अभिव्यक्त किया जाये। इस प्रकार विषय में तल्लीन होकर, वैज्ञानिक संज्ञान उस [सतही] जांच [के तरीके] को भूल जाता है, जो विषयवस्तु से [जूझने केबजाय] सिर्फ वापस मुड़कर खुद की ओर लौटता है। विषयवस्तु में मग्न होकर, और उसके साथ आगे बढ़ते हुए, वैज्ञानिक संज्ञान अपने भीतर लौटता है — लेकिन तब ही, जब विषयवस्तु और उसकी बारीकियां स्वयं में वापस लौटती हैं; [विषयवस्तु] निश्चितता में अपने को सरल बना लेती है, स्वयं को मौजूदगी के एक पक्ष तक सीमित रखती है, और अपने उच्चतर सत्य में प्रवेश करती है। इस तरह वह सरल, स्वयं को जांचने वाली समपूर्णता, उस समृद्धि से उभरती है जिसमें उसका चिंतन खो सा गया था।
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क्योंकि — जैसा कि हमने ऊपर कहा है — मूलतत्व आम तौर पर स्वभावतः व्यक्ति-कर्ता है, इसलिए विषयवस्तु, मूलतत्व का अपने में अपना प्रतिबिंब/प्रतिवर्तन है। उसकी [मूलतत्व की] मौजूदगी का स्थायित्व या सार उसके अपने-साथ-समानता है; क्योंकि, अपने-साथ-असमान होना उसका विघटन होगा। लेकिन अपने-साथ-समानता निरा अमूर्तन है; और निरा अमूर्तन ही सोचना है। जब मैं गुण कहता हूँ, तो मेरा कहने का आशय है सरल [अखंड] निश्चितता; गुण के कारण ही एक मौजूदगी दूसरे से भिन्न होता है, या मौजूदगी होता है; वह अपने-लिए -होता है, या अपने साथ सरल एकरूपता के कारण बना रहता है। इसी वजह से वह मूलतः सोच ही है। इस बात से यह समझा जा सकता है कि अस्तित्व [या होना] सोच [ही] है; यह उस अंतर्दृष्टि का स्रोत है जो मामूली अनवधारणात्मक बातें करते समय अक्सर छूट जाती है — वह अंतर्दृष्टि कि सोच और अस्तित्व एक हैं। क्योंकि किसी मौजूदगी का स्थायित्व उसका अपने-साथ-समानता है या निरा अमूर्तन है, वह स्वयं से स्वयं का अमूर्तन है; या वह अपने ही साथ स्व:असमानता है और [इस लिए] अपना विघटन है — उसकी अपनी ही अंतरात्मिकता और अपने में लौटना —उसका बनना। क्योंकि वह-जो-मौजूद-है की प्रकृति यह है, और जहां तक कि ज्ञान के लिए वह-जो-मौजूद-है की यही प्रकृति है, ज्ञान कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है जिसमें विषयवस्तु कोई बाहरी चीज़ हो, न ही वह विषयवस्तु से मुंह मोड़कर अपने में लौटने वाला प्रतिवर्तन है; विज्ञान वह आदर्शवाद नहीं है जो दावे के सिद्धांतवाद की जगह आश्वासन का सिद्धांतवाद, या आत्म-निश्चितता का सिद्धांतवाद पेश करे; विपरीत रूप से क्योंकि ज्ञान विषयवस्तु को अपने अंतरात्मिकता में लौटते देखता है, इसकी प्रक्रिया विषयवस्तु में लीन होती है (क्योंकि वह विषयवस्तु का अंतर्निहित आत्मा है), और साथ ही साथ वह [ज्ञान] अपने में वापस लौटता है (क्योंकि वह अन्यता में निरा आत्म-समानता है); इस तरह यह वह चालाकी है जो, सक्रियता से बचने का आभास तो देती है लेकिन यह देखती रहती है कि कैसे निश्चितता और उसकी ठोस जैविकता (ठीक वहीं, जहाँ वह यह मानता है कि वह अपनी आत्म-सुरक्षा और विशेष हित का पीछा कर रहा है), असल में (उल्टा) अपने-आप को घुलाकर संपूर्णता के एक पहलू में बदलने वाली प्रक्रिया है।
55. पहले हमने समझ का महत्व मूलतत्व की स्वचेतनता [या बनने] के परिप्रेक्ष्य में व्यक्त किया था; अब यहाँ [पैराग्राफ 54 में] कही गई बातों से हम साफ़ देख सकते हैं कि मूलतत्व के [अचल समरूपता के रूप में] होने के निर्धारण में इसका क्या महत्व है।—
मौजूदगी गुण [के अलावा कुछ नहीं] है और स्व-समान निश्चितता है, या निश्चित सरलता है, निश्चित सोच; यही मौजूदगी की [अपनी] समझ है। यही वजह है कि मौजूदगी ही नूस है, जिसे सबसे पहले अनाक्सागोरस ने सार के रूप में पहचाना। उनके उत्तराधिकारियों ने मौजूदगी के प्रकृति को और अधिक निश्चितता से आइडोस [eidos] या प्रत्यय [idea] के रूप में समझा, यानी निश्चित सार्वभौमिकता, प्ररूप। आजकल प्रचलित ‘सुंदर’, ‘पवित्र’ और ‘शाश्वत’ जैसे ‘सत्य-प्रत्ययों’[105] के लिए ‘प्ररूप’ शब्द का इस्तेमाल बहुत साधारण और तुच्छ लग सकता है। लेकिन वस्तुतः ‘सत्य-प्रत्यय’ प्ररूप से न अधिक है, न ही कम। लेकिन आजकल हम देखते हैं कि कोई ऐसा शब्द, जो किसी अवधारणा को सीधे निश्चयात्मक ढंग से व्यक्त करता है, उसे ठुकरा कर उसकी जगह कोई परायी भाषा का शब्द इस्तेमाल किया जाता है, जो अधिक उपदेशात्मक[106] लगता है, और उस अवधारणा को धुंध में ढक देता है।—क्योंकि मौजूदगी को प्ररूप के रूप में निश्चित किया गया है, वह सरल सोच है; नूस, सरलता, ही [स्थिर] मूलतत्व है। अपनी इसी सरलता या स्व-समानता की वजह से मूलतत्व स्थिर और स्थायी लगता है। पर यह स्व-समानता नकारात्मकता भी है; यही वजह है कि यह मज़बूत मौजूदगी अपने ही विघटन की ओर बढ़ता है। शुरू में निश्चितता [गुण] सिर्फ इसलिए वैसी ही [निश्चितता जैसी] लगती है क्योंकि वह किसी अन्य से सम्बद्ध है, और उसकी हरकत किसी बाहरी ताकत से चालित होती हुई लगती है; पर वास्तव में इस सोच की सरलता में ही यह बात निहित है कि निश्चितता में उसकी अन्यता भी शामिल है और वह स्व-चालित है। क्योंकि यह सरलता ही है स्व-चालित और स्व-फर्ककारी सोच; यह अपनी ही आंतरिकता है, निरी अवधारणा। इस तरह समझ की बौद्धिकता एक बनना है, और इस बनने में ही यह युक्तियुक्तता है।
56. जो [मौजूद] है, उसका स्वभाव यही है कि वह अपने अस्तित्व में ही अपनी अवधारणा हो; और इसी स्वभाव में सामान्यतः तार्किक अनिवार्यता निहित है। यही जैविक संपूर्णता की तर्कसंगतता और लय है; यह विषयवस्तु का ज्ञान है, वैसे ही जैसे विषयवस्तु स्वयं अवधारणा और सार है — या केवल यही विचारात्मक[107] है। — ठोस रूप, अपने को चालित करते हुए, स्वयं को एक सरल निश्चितता में रूपांतरित करता है; इस तरह वह अपने को तार्किक स्तर तक उठाता है और अपने सारत्व में होता है; उसकी ठोस मौजूदगी यही हरकत है और यह बिना मध्यस्थता के तार्किक मौजूदगी है। इसी वजह से विषयवस्तु पर बाहर से कोई रूपवाद थोपना ज़रूरी नहीं है;रूपवाद की तरफ बढ़ने की प्रवृत्ति विषयवस्तु में निहित है, हालांकि वह अब बाह्य रूपवाद नहीं रहता, क्योंकि रूप ठोस विषयवस्तु का जैविक बनना ही है।
57. वैज्ञानिक विधि का स्वरूप यह है कि पहले तो वह अपने विषयवस्तु से अलग न हो, और दूसरी तरफ यह है कि वह अपना लय स्वयं निर्धारित करती है; जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, इस स्वरूप की सही अभिव्यक्ति विचारात्मक दर्शन में होती है। — जो हम यहाँ कह रहे हैं वह अवधारणा को तो व्यक्त करता है, पर यह केवल एक पूर्व निश्चित आश्वासन के अलावा कुछ नहीं है। इसकी सत्यता इस आंशिक वर्णनात्मक विवरण में नहीं है; इसलिए अगर कोई यह कहे कि यह ठीक नहीं है, बल्कि ऐसा या वैसा है, और परंपरागत धारणाओं को याद कर उन्हें स्थिर और परिचित सत्यों के रूप में दोहराए, या फिर हमें भीतर की दैवीय अंतर्दृष्टि के मंदिर से निकली नई बातों का आश्वासन दे — तो भी यह सत्य खंडित नहीं होता। ऐसी प्रतिक्रिया अक्सर किसी अपरिचित विचार का सामना करने पर ज्ञान की पहली प्रतिक्रिया होती है: वह उसका प्रतिरोध करता है ताकि अपनी स्वतंत्रता, अपनी सूझबूझ, और अपना अधिकार किसी दूसरे सत्ता से बचाए रख सके (क्योंकि नई बात सबसे पहले इसी पराये रूप में प्रकट होती है) — और इस तरह कुछ [नया] सीखने की संभावना से छुटकारा पाए, और उस शर्म से भी जो इस [सीखने] से जुड़ा माना जाता है। उसी तरह, जब किसी अपरिचित विचार का स्वागत तालियों से किया जाता है, तो वह भी इसी तरह की प्रतिक्रिया है — वह वैसी ही है जैसी किसी दूसरे संदर्भ में अति-क्रांतिकारी भाषा और र्रवाई के लिए होते हैं।
58. इस लिए विज्ञान के अध्ययन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अवधारणा की मेहनत को अपने ऊपर लिया जाए। इसके लिए ज़रूरी है कि हम अवधारणा पर ही ध्यान दें, जैसे कि अपने*-आप-में-होना*, अपने-लिए-होना, स्व-समान-होना आदि जैसी सरल निश्चितताएं — क्योंकि ये नीरा स्व-चालन हैं; इन्हें ‘आत्माएँ’ कहा जा सकता था अगर इनकी अवधारणा ‘आत्मा’ से भी ऊँची किसी सत्ता को नामित नहीं करती। अवधारणा से रोके जाने पर अभिवेदनों में भागते रहने की आदत को उतनी ही परेशानी होती है जितनी रूपात्मक सोच को, जो वास्तविकता से बिछड़े विचारों में आगे-पीछे घूमती रहती है। ऐसी [अभिवेदनों में भागने वाली] आदत को वस्तुग्रस्त सोच कहा जाना चाहिए — एक निर्भर[108] चेतना जो केवल वस्तुगतता में डूबी रहती है; और इसलिए साथ ही साथ उसे अपने आप को उस वस्तुगतता से ऊपर उठाकर अपने साथ होना कष्टदायक लगता है। इसके विपरीत, दूसरी प्रणाली — तर्क-चातुर्य — विषयवस्तु से स्वतंत्र होना है, और उसके प्रति एक घमंडी और अवज्ञासूचक मनोभाव है। यह ज़रूरी है कि वह इस स्वतंत्रता को त्यागने की मेहनत की जाए और अपनी [व्यक्ति-कर्ता की] इच्छा को विषयवस्तु के चालक सिद्धांत बनाने के बजाय, इस स्वतंत्रता को विषयवस्तु में विलीन किया जाए, ताकि विषयवस्तु अपने स्वभाव के अनुसार चले —यानी कि आत्म का आत्म के रूप में स्व-चालन — और इस हरकत पर सोच-विचार किया जाए। अवधारणाओं की अंतर्निहित लय पर व्यक्तिगत हस्तक्षेप से संयम, अपनी मनमानी या बाहरी ज्ञान से उस लय में दखल देने से संयम — यही संयम अवधारणा पर मनन का एक आवश्यक संतुलक है।
59. तर्क-चातुर्य वाली प्रवृत्ति में हमें उन दो पहलुओं पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है जिनके संदर्भ में अवधारणात्मक सोच उसके विपरीत है। — पहला,[109] वह जिस विषयवस्तु से जूझती है उसके प्रति एक नकारात्मक रुख़ अपनाती है; वह उसका खंडन और उसे मिटा देना जानती है। “यह ऐसा नहीं है” — ऐसी अंतर्दृष्टि सिर्फ नकारात्मक है; यह एक अंधी गली है जो किसी नई विषयवस्तु तक नहीं पहुँचाती; फिर कोई और विषयवस्तु के लिए उसे कहीं और से कुछ उठा लेना पड़ता है। तर्क-चातुर्य रिक्त मैं में प्रतिवर्तन है — अपने ज्ञान की व्यर्थता/घमंड है। — पर यह व्यर्थता सिर्फ़ उस विषयवस्तु की नहीं, बल्कि इसी अंतर्दृष्टि की भी व्यर्थता को बयान करती है; क्योंकि यह अंतर्दृष्टि ऐसा नकार है जो अपने अन्दर मौजूद सकारात्मक पक्ष को देख नहीं पाती। चूंकि यह प्रतिवर्तन अपनी ही नकारात्मकता को अपना विषयवस्तु नहीं बनाती, इसलिए यह कभी भी मुद्दे के अंदर नहीं जाती, बल्कि हमेशा उसके सतह पर मँडराती रहती है; इसी वजह से यह कल्पना करती है कि अपनी शून्यता की पुष्टि के ज़रिए वह हमेशा विषयवस्तु से भरपूर अंतर्दृष्टि से कहीं आगे होती है। इसके विपरीत, अवधारणात्मक सोच में — जैसा कि हमने ऊपर दिखाया है — नकार विषयवस्तु का हिस्सा है, और सकारात्मक भी है: विषयवस्तु की अंतर्निहित हरकत और साथ ही साथ उसकी निर्धारण-प्रक्रिया के रूप में, और इस निरंतर परिवर्तन के रूप में भी। परिणाम स्वरूप यह वही है जो इस निरंतर परिवर्तन से उभरता है — निर्धारित नकार — और इसीलिए एक सकारात्मक विषयवस्तु भी है।
60. लेकिन यह ध्यान में रखते हुए कि ऐसी सोच की एक विषयवस्तु होती है — चाहे वह चित्र-चिंतन की हो, विचार की हो, या दोनों के मिश्रण की। उसमें एक दूसरा पहलू भी होता है, जो उसे समझने में कठिन बना देता है। इस पहलू की विशिष्टता ऊपर कही गई सत्य-प्रत्यय की सार से ही गहराई से जुड़ी हुई है; या यों कहें तो, यह सत्य-प्रत्यय का प्रकट रूप, जो विचारात्मक बूझ की हरकत है, यह पहलू उसे व्यक्त करता है। -- क्योंकि एक तरफ जिस नकारात्मक दृष्टिकोण की हमने अभी चर्चा की, उसमें तर्क-चातुर्य वाली सोच खुद ही आत्म[110] है जिसमें विषयवस्तु लौट आती है; इसके विपरीत, तर्क-चातुर्य की सकारात्मक संज्ञान में आत्म एक [तार्किक] प्रतिनिधिक[111] विशेष्य है, जिसके साथ विषयवस्तु गैर-ज़रूरी विशेषण और विधेय के रूप में जोड़ा जाता है। यही विशेष्य वह आधार बनता है, जिससे विषयवस्तु जुड़ी रहती है, और जिस पर [तर्क-चातुर्य की सोच की] हरकत मंडराती रहती है। अवधारणात्मक सोच की प्रक्रिया इससे अलग है। क्योंकि अवधारणा प्रतिपाद्य विषय[112] की ही आत्म होती है, जो [इस संदर्भ में] खुद को अपने बनने [की प्रक्रिया] के रूप में प्रस्तुत करती है; इसलिए वह कोई स्थिर विशेष्य नहीं है, जो खुद अचल [और अपरिवर्तित] रहकर [एक खूंटी की तरह] गैर-ज़रूरी विशेषणों को टांगे रखे। इसके विपरीत, अवधारणा ही खुद को चलमान [और परिवर्तनशील] करते हुए, अपनी निर्धारितताओं को अपने में वापस ले लेती है। इस हरकत से स्थिर विशेष्य खुद तबाह हो जाता है; वह अलग खड़े रहने के बजाय विशिष्टताओं और विषयवस्तु के भीतर प्रवेश करता है और निर्धारितता का निर्माण करता है —यानी कि विशिष्ट विषयवस्तु और उसकी हरकत बन जाता है। इस तरह तर्क-चातुर्य को जिस अचल विशेष्य में अपना दृढ़ आधार मिलता था, वह आधार डगमगा जाता है, और अब सिर्फ यही हरकत प्रतिपाद्य विषय बन जाती है। जो विशेष्य अपनी विषयवस्तु की [विधेय के ज़रिए] परिपूर्ति करता है, वह उससे आगे नहीं बढ़ता; और न ही उससे कोई अन्य विधेय या गैर-ज़रूरी गुण जोड़े जा सकते हैं। दूसरी ओर, विषयवस्तु का जो [गैर-ज़रूरी] बिखराव था, वह अब आत्म के अंतर्गत संघटित हो जाता है; विषयवस्तु अब ऐसी सार्वभौम[113] नहीं रह जाती, जो विशेष्य से मुक्त होकर दूसरे अनेकों पर लागू हो सके। इसलिए विषयवस्तु अब वास्तव में विशेष्य का विधेय नहीं रह जाती; वही मूलतत्व है, वही सार है, वही वह अवधारणा है, जिसके बारे में हम बात कर रहे हैं। अभिवेदनात्मक [यानी कि तर्क-चातुर्य से जुड़ी हुई] सोच की प्रकृति यह है कि वह गैर-ज़रूरी गुणों या विधेयों का अनुसरण करे और उनसे आगे बढ़े—और यह ठीक भी है, क्योंकि वे सिर्फ विधेय और गैर-ज़रूरी ही होते हैं। लेकिन जब किसी [तार्किक] वाक्य में विधेय का रूप लेने वाली इकाई मूलतत्व ही है, तब इस सोच में रुकावट आ जाती है। मानो उसे एक प्रतिघाती धक्का लगा हो। इसकी [सोच की] शुरुआत विशेष्य से होती है, मानो वह उसका बुनियादी आधार हो; लेकिन जब विधेय मूलतत्व ही होता है, तब उसे [सोच को] यह समझ आता है कि विशेष्य विधेय में प्रवेश कर चुका है और फलस्वरूप उसका उदात्तीकरण हो गया है। और इस तरह से जो विधेय जैसा लग रहा था, वही अब सम्पूर्ण और स्वतंत्र समग्र बन जाता है, इसलिए सोच अब आज़ादी से चल-फिर नहीं पाती, बल्कि उस भार से बाधित हो जाती है। आम तौर पर पहले विशेष्य को एक वस्तुपरक, स्थिर आत्म के रूप में आधार बनाया जाता है------और वहीं से ज़रूरी हरकत निर्धारितताओं या विधेयों की अनेकत्व की ओर बढ़ती है। यहाँ जानने वाला मैं स्वयं इस विशेष्य की जगह ले लेता है और विधेयों को बांधने और उन्हें आधार देने वाला व्यक्ति-कर्ता बन जाता है। इस दूसरे विशेष्य [व्यक्ति-कर्ता, मैं] का इरादा पहले विशेष्य से नाता तोड़ कर उससे परे अपने आप में लौट आना है। लेकिन चूंकि पहला विशेष्य निर्धारितताओं के भीतर ही प्रवेश कर चुका है और वही उनकी आत्मा है, इसलिए दूसरा विशेष्य —अर्थात जानने वाला मैं [व्यक्ति-कर्ता] अब भी विधेय में उसे [पहले विशेष्य को] ही पाता है। और इस लिए वह [व्यक्ति-कर्ता] विधेय की हरकत की प्रेरक शक्ति नहीं बन पाता है, जो तर्क-चातुर्य से यह निश्चित करे कि यह या वह [कौन-सा] विधेय पहले विशेष्य पर आरोपित किया जाए। उसे अब भी विषयवस्तु की आत्म से जूझना पड़ता है; उसे [समझ में आता है कि] उसके [यानी कि विषयवस्तु के आत्म] साथ सहयोग करना पड़ेगा, बजाय इसके कि वह [व्यक्ति-कर्ता] अपने-लिए-हो।
61. हमने जो अब तक कहा है, उसे रूप के तहत इस तरह व्यक्त किया जा सकता है; सामान्यतः निर्णयन या तर्क-वाक्य की विशिष्टता (जिसमें विशेष्य और विधेय के बीच भेद होता है) विचारात्मक तर्क-वाक्य से नष्ट हो जाता है; और जिस तादात्म्यात्मक तर्क-वाक्य में साधारण तर्क-वाक्य परिणत होता है, उसमें विशेष्य–विधेय संबंध के विरुद्ध प्रत्याघात रहता है।—सामान्य तर्क-वाक्य के रूप और अवधारणा की ऐक्यता के बीच यह टकराव, जो उस रूप को नष्ट करता है, उसी तरह है जैसे लय[114] में छंद[115] और लहज़े[116] के बीच का टकराव होता है। लय उस तैरते हुए केंद्र और दोनों (छंद और लहज़े) के एकीकरण से उत्पन्न होती है। इसी तरह दार्शनिक तर्क-वाक्य में विशेष्य और विधेय की तादात्म्यता का लक्ष्य उनके बीच के उस भेद को मिटाना नहीं है, जिसे तर्क-वाक्य का रूप व्यक्त करता है; बल्कि उनकी ऐक्यता को सामंजस्य के रूप में उभारना है। तर्क-वाक्य का रूप निर्धारित अर्थ का उभार है — यानी कि वह लहज़ा जो उसके निश्चयन में विशिष्टता लाता है; लेकिन यह तथ्य कि विधेय मूलतत्व को व्यक्त करता है, और विशेष्य स्वयं सार्वभौम में निहित हो जाता है, यही [तथ्य] वह ऐक्यता है जिसमें लहज़ा विलीन हो जाता है।
62. कुछ उदाहरण हमारी कही हुई बात को स्पष्ट कर देंगे। “ईश्वर है सत्त” इस प्रस्ताव में विधेय “सत्त” है; उसका एक सारात्मक अर्थ है, जिसमें विशेष्य समा जाता है। यहाँ “सत्त” को सिर्फ विधेय नहीं, बल्कि सार माना जाना चाहिए; इस वजह से, तर्क-वाक्य की संरचना के अनुसार ईश्वर जो स्थिर विशेष्य है, वह अब वैसा नहीं रह जाता। विशेष्य से विधेय की ओर संक्रमण में आगे बढ़ने के बजाय, विशेष्य के लुप्त हो जाने से चिंतन में रुकावट आ जाती है और, क्योंकि उसे वह वहाँ नहीं मिलता है, वह फिर से विशेष्य के विचार पर वापस धकेला जाता है; या, चूँकि विधेय स्वयं विशेष्य के रूप में व्यक्त हुआ है—यानी कि सत्त विशेष्य की सार की प्रकृति को पूरी तरह से व्यक्त करता है—इसलिए चिंतन विशेष्य को विधेय में भी अमध्यस्थतः पा लेता है। और अब, विधेय में [से वापस] अपने भीतर प्रवेश कर तर्क-चातुर्य की स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने के बजाय, वह अभी भी विषयवस्तु में ही तल्लीन रहता है, या कम-से-कम उसमें तल्लीन होने की ज़रूरत का सामना करता है। इसी तरह, जब कहा जाता है: “वास्तव सार्वभौम है”, तो “वास्तव” विशेष्य के रूप में अपने विधेय में विलीन हो जाता है। “सार्वभौम” का अर्थ सिर्फ विधेय नहीं होना चाहिए—इस प्रसंग में तर्क-वाक्य का कथन यह होगा कि वास्तव सार्वभौमिक है; इसके विपरीत, “सार्वभौम” का आशय वास्तव के सार को व्यक्त करना है। इस तरह, चिंतन उस दृढ़ वस्तुगत आधार को खो देता है जो उसे विशेष्य में प्राप्त था (और उतना ही विधेय भी), वह फिर से विशेष्य और विधेय में धकेल दिया जाता है। वह स्वयं में वापस आने के बजाय विषयवस्तु के विषय में लौट जाता है।
63. यह अनभ्यस्त अवरोध ही काफी हद तक उन शिकायतों का स्रोत है जो दार्शनिक लेखन की अस्पष्टता के बारे में की जाती हैं जबकि इसके अतिरिक्त उन्हें समझने की दूसरी सांस्कृतिक शर्तें व्यक्ति में मौजूद होती हैं। हमारी कही गई बातों में हम उस पूर्णतः निश्चित आपत्ति का कारण देखते हैं जो अक्सर दार्शनिक लेखन के खिलाफ उठाई जाती है: कि उन्हें समझने से पहले इतना कुछ बार-बार पढ़ना पड़ता है—एक ऐसी आपत्ति जिसका बोझ इतना घोर और अंतिम माना जाता है कि अगर उसकी बुनियाद मज़बूत हो, तो उसके खिलाफ कोई जवाब संभव नहीं रहता। ऊपर कही हुई बात से माजरा साफ हो जाता है। दार्शनिक तर्क-वाक्य, क्योंकि वह तर्क-वाक्य है, इस मत को पैदा करता है कि विशेष्य और विधेय के बीच का सामान्य सम्बन्ध और ज्ञान का प्रचलित दृष्टिकोण यहाँ भी लागू होगा। तर्क-वाक्य कादार्शनिक आशय इस दृष्टिकोण और उसके बारे में बने मत—दोनों को ध्वंस कर देता है; मत अनुभव से सीखता है कि उसका [तर्क-वाक्य का] अर्थ वैसा नहीं है जैसा उसने सोचा था; और अपने मत की यह सुधार ज्ञान को मजबूर करता है कि वह फिर से उसी तर्क-वाक्य की ओर लौटे और अब उसे एक अलग तरीके से देखे।
64. एक कठिनाई, जिससे बचना चाहिए, तब पैदा होती है जब अवधारणात्मक तरीका और तर्क-चातुर्यपूर्ण तरीके को मिला दिया जाता है, जब विशेष्य के बारे में कही गई बात कभी उसकी अवधारणा का अर्थ होता है, और कभी उसका अर्थ सिर्फ उसके विधेय या उसके बेतरतीब गुण का होता है।—एक तरीका दूसरे का विरोध करता है। सिर्फ वही दार्शनिक निरूपण ढलने-ढालने की शक्ति प्राप्त करेगा जो तर्क-वाक्य के भागों के बीच के सामान्य सम्बन्ध को सख्ती से बाहर रखे।
65. वास्तव में अ-विचारात्मक सोच का अपना एक अधिकार है, जो मान्य है, लेकिन विचारात्मक तर्क-वाक्य के तरीके में उसे नज़र अन्दाज़ कर दिया जाता है। तर्क-वाक्य के रूप का उदात्तीकरण सिर्फ अमध्यस्थ रूप में, या केवल उसके विषयवस्तु के माध्यम से नहीं होना चाहिए। बल्कि इस विपरीत हरकत को व्यक्त किया जाना चाहिए; यह सिर्फ अंदरूनी अवरोध नहीं होना चाहिए; बल्कि अवधारणा का अपने में इस वापसी को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह हरकत (जिसे पहले प्रमाण से साबित किए जाने की अपेक्षा थी) वास्तव में तर्क-वाक्य की अपनी द्वंद्वात्मक हरकत है। यह हरकत ही यथार्थ विचारात्मक[117] है, और इस हरकत की अभिव्यक्ति ही विचारात्मक प्रस्तुति है। तर्क-वाक्य के रूप में, विचारात्मक सिर्फ अंदरूनी अवरोध और तत्त्व का अपने भीतर लौटना है, लेकिन ऐसा लौटना जिसमें मौजूदगी [स्पष्ट] नहीं है। इसी वजह से हम अक्सर देखते हैं कि दार्शनिक विवेचन हमें इस अंदरूनी अंतर्दृष्टि की ओर ले जाते हैं, और इस तरह जो हमें चाहिए था—तर्क-वाक्य की द्वंद्वात्मक हरकत की प्रस्तुति—उसको रोक दिया जाता है।—तर्क-वाक्य से यह अपेक्षा है कि सत्य क्या है उसे व्यक्त करे; लेकिन मूलतः सत्य व्यक्ति-कर्ता है; और इस तरह वह सिर्फ द्वंद्वात्मक हरकत है—वह स्वतः क्रमिक प्रवाह[118], जो स्वयं को बनाता है, अपना रास्ता खुद चुनता है, और अपने भीतर लौटता है।—दूसरी तरह के संज्ञान में प्रमाण इस पहलू का, यानी कि व्यक्त अंतरत्व का, निर्माण करता है। लेकिन जब द्वंद्वात्मकता को प्रमाण से अलग कर दिया जाता है, तब वास्तव में दार्शनिक प्रतिपादन की अवधारणा गायब हो जाती है।
66. इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि द्वंद्वात्मक हरकत के भी घटक या अंश तर्क-वाक्य होते हैं; इस लिए जो कठिनाई ऊपर बताई गई है, वह मानो फिर से लौट आती है और मूल विषय की अपनी ही कठिनाई जैसी लगती है।—यह उसी तरह है जैसे साधारण प्रमाण में होता है, जहाँ जिन आधार-कारणों का उपयोग किया जाता है, वे स्वयं फिर किसी अन्य आधार-कारण की माँग करते हैं, और यह अनंत क्रम चलता जाता है। लेकिन ऐसा आधार-स्थापन और शर्तबद्धता की संरचना उस प्रकार के प्रमाण से संबंधित है जो द्वंद्वात्मक हरकत से अलग है, और इसलिए वह बाह्य संज्ञान के अंतर्गत आता है। जहाँ तक द्वंद्वात्मक हरकत का सवाल है, उसका माध्यम शुद्ध अवधारणा है; इस लिए उसकी विषयवस्तु ऐसी है जो अपने आप में पूरी तरह से व्यक्ति/कर्ता है। अतः कोई ऐसी विषयवस्तु नहीं होती जो एक द्रव्य-रूप[119] विशेष्य का काम करे, और जिस पर विधेय के रूप में एक अर्थ आरोपित किया जाए; [बल्कि] तर्क-वाक्य सीधे ही[120] एक खोखली संरचना मात्र रह जाता है।—इंद्रियों से अनुभूत या प्रतिनिधिक आत्म के अलावा, नाम सिर्फ नाम के रूप में मुख्यतः उस नीरे विशेष्य को निर्दिष्ट करता है: वह खोखला अवधारणाहीन एक। इसी वजह से, उदाहरण के तौर पर, ‘ईश्वर’ नाम से बचना फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि यह शब्द अपने आप में एक अवधारणा को व्यक्त नहीं करता; बल्कि एक नाम मात्र[121] ही है, द्रव्य-रूप विशेष्य का एक स्थिर ठहराव; इसके विपरीत उदाहरणतः, सत्ता या एक, एकलता, व्यक्ति/कर्ता आदि शब्द सीधे अपने आप में ही अवधारणाओं को भी संकेतित करते हैं।—अगर इस विशेष्य के बारे में विचारात्मक सत्य कहे भी जाएँ, तब भी उनकी विषयवस्तु में अंतर्निहित अवधारणा की कमी रहती है, क्योंकि यह विषयवस्तु एक स्थिर विशेष्य के रूप में प्रस्तुत होती है; और ऐसे हालात में ऐसे सत्य आसानी से उपदेश-मात्र का रूप धारण करते हैं। इस तरफ से भी विचारात्मक विधेय को [साधारण] तर्क-वाक्य के संरचना के अनुसार (न कि अवधारणा और सार के अनुसार) समझने की आदत से जो अड़चन पैदा होती है,—उसका बढ़ना या घटना दार्शनिक प्रस्तुति पर निर्भर हो सकता है। इस प्रस्तुति को, अवधारणा के स्वरूप के बारे में अंतर्दृष्टि के प्रति निष्ठावान रहते हुए, द्वंद्वात्मक संरचना को बनाए रखना चाहिए और सिर्फ वही स्वीकार करना चाहिए जो अवधारित हो और अवधारणा हो।
67. अगर तर्क-चातुर्य का रवैया फलसफे के अध्ययन में बाधा है, तो वह अकड़ जो बिना किसी तर्क-वितर्क के ही निश्चित सत्यों का प्रदर्शन करता है, उससे कम बाधक नहीं है। ऐसे सत्यों का धारक उन्हें फिर से जाँचने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं करता; वह उन्हें ही आधार बना लेता है और यह मानता है कि उन्हीं के ज़रिए वह न केवल उन्हें व्यक्त कर सकता है, और उन्हीं के सहारे निर्णय और विवाद भी कर सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यह खास करके ज़रूरी है कि दार्शनिक चिंतन को फिर से एक गंभीर प्रयास बनाया जाए। सभी विज्ञानों, कलाओं, कौशलों और शिल्पों के मामले में लोग इस बात को मान के चलते हैं कि दक्षता के लिए सीखने और अभ्यास का एक जटिल और मेहनत भरा कार्यक्रम ज़रूरी है। लेकिन जब बात दर्शन की आती है, तो ऐसा लगता है कि प्रचलित पूर्वधारणा यह है कि—हालाँकि हर वह व्यक्ति जिसके पास आँखें और उँगलियाँ हैं, और जिसे चमड़ा और औज़ार मिल भी जाएँ, तो वह जूते बनाने लायक नहीं हो जाता—फिर भी हर व्यक्ति तुरंत यह समझ लेता है कि दर्शन कैसे करना है और दर्शन का मूल्यांकन कैसे करना है, क्योंकि उसके पास इसका मापदण्ड उसकी साधारण बुद्धि में ही मौजूद है—जैसे कि उसके अपने पैर में ही जूते का माप भी उतना ही मौजूद न हो। ऐसा लगता है कि दार्शनिक सक्षमता सूचना और अध्ययन के अभाव में ही निहित है, मानो दर्शन वहीं समाप्त हो जाता हो जहाँ ये शुरू होते हैं। दर्शन को अक्सर एक रूपात्मक ज्ञान के तरह माना जाता है, जो विषयवस्तु से रिक्त है; और इस समझ की सख्त कमी है कि किसी भी ज्ञान क्षेत्र या विज्ञान की विषयवस्तु में जो भी सत्य हो, वह तभी उस नाम का अधिकारी हो सकता है जब वह दर्शन से पैदा हुआ हो; अन्य विज्ञान चाहे जितना भी तर्क-वितर्क कर लें, दर्शन के बिना उनमें न तो सजीवता होती है, न चित्त, और न ही सत्य।
68. जहाँ तक सच्चे दर्शन का सवाल है, वह एक लम्बी शिक्षा-यात्रा के अंत में स्थित होता है—ऐसी हरकत जो जितनी विस्तृत है उतनी ही गहरी भी—जिसके ज़रिए चित्त ज्ञान तक पहुँचता है। इसके बजाय हम [क] ठोस सामान्य ज्ञान देखते हैं, जिसने कभी सच्चे दर्शन या किसी और ज्ञान के क्षेत्र में ना मेहनत किया है और ना शिक्षा प्राप्त किया है; और [ख] साथ ही, दिव्य का सीधा प्रकटीकरण; जो [दोनों क और ख] अपने को इस पूरी यात्रा का एकदम सही विकल्प मानते है, और उतना ही बढ़िया विकल्प समझते हैं जितना कि चिकोरी को कॉफी का [विकल्प] कहा जाता है। यह देख कर तकलीफ होती है कि अज्ञान और वह भद्दापन, जिसमें न कोई रूप है न रुचि, और जो अपने चिंतन को एक भी अमूर्त तर्क-वाक्य पर केंद्रित नहीं कर सकता—कई तर्क-वाक्यों के आपसी संबंध की तो बात ही छोड़िए — कभी अपने को सोच की आज़ादी और सहनशीलता का नाम देता है, और कभी प्रतिभा का नाम भी देता है। प्रतिभा, हम जानते हैं, कभी काव्य में बहुत प्रचलित थी[122], जैसे आज वह दर्शन में है; लेकिन जब इस प्रतिभा से निकली रचनाओं का कुछ मतलब भी निकलता था, तब भी वे काव्य की जगह तुच्छ गद्य ही उत्पन्न करती थीं, या अगर उससे आगे बढ़ती थीं, तो बेतरतीब भाषणों का रूप ले लेती थीं। इसी तरह आजकल दर्शन करने का एक "सीधा-साधा’ तरीका—जो अपने को अवधारणा से कहीं बेहतर समझता है और अवधारणा के अभाव के कारण अपने को अंतर्ज्ञानात्मक और काव्यात्मक चिंतन मानता है— यह जन-समक्ष ऐसी कल्पना के मनमाने जोड़-तोड़ पेश करता है, जिसे [अधकच्चे] विचार ने बिखेर दिया है; ऐसी रचनाएँ जो न इधर की हैं न उधर की—न काव्य, न ही दर्शन
69. दूसरी ओर, जब स्वाभाविक दार्शनिकता ठोस सामान्य ज्ञान की अपेक्षाकृत शांत प्रवाह में बहती है, तब वह ज़्यादा-से-ज़्यादा तुच्छ सच्चाइयों की एक बयानबाज़ी ही प्रस्तुत करती है। अगर इन सच्चाइयों की तुच्छता पर आपत्ति की जाए, तो वह (साधारण ज्ञान) उत्तर में यह यकीन दिलाती है कि उनका अर्थ और उनकी पूर्ति उसके दिल में बसते हैं, और इसलिए वे दूसरों के दिलों में भी मौजूद होने चाहिए; क्योंकि सामान्यतः उसका विश्वास यह होता है कि दिल की मासूमियत, अंतरात्मा की निर्मलता आदि की दुहाई देकर उसने आखिरी बात कह दी है, जिसके खिलाफ कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती और जिसके आगे कुछ और माँगा भी नहीं जा सकता। लेकिन सवाल यह था कि जो श्रेष्ठ है, वह गुफा के अंदर छुपा न रह जाए, बल्कि उसे बाहर निकालकर दिन के उजाले में लाया जाए। इस तरह की परम सच्चाइयों को पेश करने की मेहनत को बहुत पहले ही बचाया जा सकता था; क्योंकि वे तो बहुत पहले से धर्मोपदेश-पुस्तकों, प्रचलित कहावतों आदि में मौजूद रहे हैं।—ऐसी सच्चाइयों की अनिश्चितता या उनके टेढ़ेपन को पहचानना मुश्किल नहीं है; और अक्सर उसी चेतना के भीतर उनसे विपरीत सच्चाइयों को भी उजागर करना आसान होता है। जब चेतना अपने भीतर पैदा हुई इस उलझन से निकलने की कोशिश करती है, तब वह एक नई उलझन में जा गिरती है, और हो सकता है कि आखिर भड़ककर यह दावा करने लगे कि बात तो निर्णायक रूप से ऐसी ही है, बाकी सब कुतर्क है—यह सामान्य ज्ञान का वह घिसा-पिटा जुमला है, जिसे वह तराशे हुए तर्क के आगे खड़ा करता है; ठीक वैसे ही जैसे दर्शन के प्रति अज्ञान उसको [दर्शन को] हमेशा के लिए “ख़याली ख़्वाब” कहकर ख़ारिज कर देने की आदत बना ली है।—चूँकि सामान्य ज्ञान भावना और अपने भीतर के दैववचन का सहारा लेता है, इसलिए जो उससे सहमत नहीं होता उससे उसका कोई सरोकार नहीं रहता; उसे यह कहना पड़ता है कि जो व्यक्ति अपने भीतर वही बात न पाए और न महसूस करे, उससे उसके पास कहने के लिए और कुछ नहीं है।—दूसरे शब्दों में, वह मनुष्यता की जड़ को पैरों तले रौंद देता है। क्योंकि मनुष्यता का स्वभाव यह है कि वह दूसरों के साथ सहमति की ओर बढ़े; और उसका अस्तित्व सिर्फ चेतनाओं के गठित समुदाय में ही निहित है। मनुष्यता-विरोधी, या पाशविक रवैया, भावना तक सीमित रह जाने में, और सिर्फ उसी के ज़रिए संवाद करने में निहित है।
70. अगर कोई विज्ञान तक पहुँचने के लिए किसी राजमार्ग की माँग करे, तो सब से आसान रास्ता इसके अलावा और कोई नहीं सुझाया जा सकता है कि वह ठोस सामान्य ज्ञान पर भरोसा करे और साथ ही, ज़माना और दर्शन की चाल से पीछे न रह जाने के लिए, दार्शनिक कृतियों की समीक्षाएँ पढ़े, और शायद उनकी भूमिकाओं के साथ साथ शुरू के पैराग्राफ भी; क्योंकि इन्हीं पैराग्राफों में वे व्यापक सिद्धांत दिए रहते हैं जिन पर सब कुछ निर्भर करता है, और समीक्षाएँ, ऐतिहासिक सारांश के अलावा, मूल्यांकन भी प्रस्तुत करती हैं—और यह [मूल्यांकन], मूल्यांकन होने के नाते, मूल्यांकित विषय से अपने को ऊंचे स्थान पर रखता है। यह सामान्य रास्ता रोज़मर्रा के कपड़ों में तय किया जाता है; लेकिन [इसके विपरीत] शाश्वत, पवित्र और अनन्त का उदात्त भाव महापुरोहित के वस्त्रों में आगे बढ़ता है—ऐसे पथ पर, जो [असल में पथ ही न हो, बल्कि] पहले से ही केंद्रस्थ अमध्यस्थ सत्ता हो, गहन मौलिक विचारों और सोच की उदात्त कौंधों की प्रतिभा हो। लेकिन जिस तरह ऐसी गहनता फिलहाल सार के स्रोत को प्रकट नहीं करती, उसी तरह ये आतिशबाज़ियाँ भी अभी तक दिव्य ज्योति-लोक नहीं हैं। सच्चे विचार और वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि सिर्फ अवधारणा के मेहनत से ही हासिल किए जा सकते हैं। सिर्फ अवधारणा ही ज्ञान की उस सार्वभौमिकता को उत्पन्न कर सकती है, जो सामान्य ज्ञान की साधारण अनिश्चितता और खोखलापन नहीं है, बल्कि साधित और परिपूर्ण संज्ञान है; और न ही वह बुद्धि के वरदान की वह निराली सार्वभौमिकता है, जो सुस्ती और प्रतिभा के दम्भ से अपने को बिगाड़ देती है, बल्कि वह सत्य जो अपने स्वाभाविक रूप तक परिपक्व हुआ हो—ऐसा सत्य जो हर आत्म-सचेतन तर्क-शक्ति की साझी संपत्ति बन सके।
71. मैं विज्ञान के अस्तित्व का आधार अवधारणा की आत्म-चालना में देखता हूँ। लेकिन सत्य के स्वरूप और आकार के विषय में हमारे ज़माने की धारणाएँ इस सोच से अलग हैं – ऊपर बताए गए सोच के नज़ारिए में और दूसरे सतही तौर पर भी। वास्तव में वे पूरी तरह से एक दूसरे के विपरीत हैं। ऐसा लगता है कि इस निर्धारण के अनुसार विज्ञान-प्रणाली को प्रस्तुत करने की कोशिश स्वीकार्य नहीं होगी। फिर भी मैं यह सोच सकता हूँ कि, मिसाल के तौर पर, कभी-कभी प्लेटो के दर्शन की महत्ता उनके उन मिथकों में खोजी गई है जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से मूल्यहीन माना जाता है – लेकिन ऐसे ज़माने भी रहे हैं (जिन्हें जोश का ज़माना कहा गया) जब एरिस्टॉटल के दर्शन को उसकी विचारात्मक गहराई के लिए सराहा गया, और प्लेटो के परमेनिडीस (जो बेशक प्राचीन द्वंद्वात्मकता की सबसे महान कलाकृति है) को दैवी जीवन के सत्य का खुलासा और उसके सकारात्मक प्रकटीकरण के रूप में देखा गया। ऐसे समय भी थे जब, परमानंद[123] से पैदा हुई सारी अस्पष्टताओं के बावजूद, इस गलत समझा हुआ परमानंद को वास्तव में निरी अवधारणा के अलावा कुछ और नहीं माना जाता था। मैं यह भी देखता हूँ कि हमारे ज़माने का दर्शन अपनी महत्ता को अपने वैज्ञानिक चरित्र में ही स्थापित करता है। और अगर दूसरे लोग उसे किसी और रूप में ग्रहण करते हों, तब भी असल में वही वैज्ञानिक चरित्र है, जिसकी वजह से वह अपना छाप छोड़ता है। इसलिए मैं भी आशा कर सकता हूँ कि अवधारणा के पक्ष में विज्ञान का औचित्य सिद्ध करने और उसे उसके अपने अनोखे माध्यम में प्रस्तुत करने की यह कोशिश (मूल विषय की अपनी आंतरिक सत्यता के बल पर) अपना रास्ता बना लेगी। हमें इस बात का विश्वास बनाए रखना चाहिए कि सच्चाई का स्वभाव ही ऐसा है कि जब उसका समय आता है तो वह विजयी होकर उभरता है; वह सिर्फ तभी प्रकट होता है जब उसका समय आ चुका होता है। इसलिए वह न तो समय से पहले और न ही जनता उसको ग्रहण करने के लिए तैयार होने से पहले प्रकट होता है। हमें यह भी विश्वास रखना चाहिए कि व्यक्ति को इस प्रभाव [यानी कि सही समय पर व्यक्तिगत सच्चाई की सार्वभौमिक स्वीकृति होगी] की ज़रूरत होती है, ताकि जो अभी तक सिर्फ उसी के लिए एक [मूल] विषय है, उसकी सच्चाई को वह साबित कर सके; और वह उस विश्वास को (जो शुरू में सिर्फ [दार्शनिक की] विशिष्टता से जुड़ा होता है) सार्वभौमिक के रूप में अनुभव कर सके। लेकिन यहाँ जनता को अक्सर उन लोगों से अलग समझना चाहिए जो खुद को जनता का प्रतिनिधि और प्रवक्ता मानते हैं। कई मामलों में जनता का दृष्टिकोण इन प्रवक्ताओं के दृष्टिकोण से काफी अलग, और उसके विपरीत भी, होता है। जब जनता किसी दार्शनिक कृति के प्रति आकर्षित नहीं होती, तब वह भले मन से दोष खुद पर लेने को तैयार रहती है। इसके विपरीत, ये प्रवक्ता अपनी काबिलियत पर इतना यकीन करते हैं कि वे सारा दोष लेखक पर ही डाल देते हैं। जनता पर इसका [दार्शनिक प्रस्थापना का] असर उन लोगों (जो की अपने लाशों को दफनाने वाले उन [बौद्धिक] लाशों की तरह हैं) की कार्यकलाप के तुलना में कहीं ज़्यादा संयत होता है। आज हमारी अंतर्दृष्टि कहीं ज़्यादा सुसंस्कृत[124] हो चुकी है, हमारा कुतूहल ज्यादा होशियार है, और हमारा फ़ैसला ज़्यादा जल्दी ही बन जाता है; इसलिए जो तुम्हें बाहर ले जाएंगे [तुम्हारा जनाज़ा निकालेंगे] उनके पाँव पहले ही दरवाज़े पर हैं। लेकिन इससे उस धीमे प्रभाव को अलग समझना चाहिए, जो उन धूमदार आश्वासनों से बटोरी गई तवज्जो को सुधारता है, और तिरस्कारपूर्ण निंदा को गलत साबित करता है, और कुछ लोगों को सिर्फ वक्त गुज़रने के बाद ही दुनिया में उनकी जगह देता है; जबकि कुछ दूसरे लोगों को कल की दुनिया में कोई जगह नहीं मिलती।
72. इत्तफ़ाक़ से, ऐसे ज़माने में जब चित्त की सार्वभौमिकता कहीं ज़्यादा मज़बूत हो गई है, और एकलता भी, जैसा कि उचित है, उसी अनुपात में कम महत्त्वपूर्ण हो गई है; और जब यह सार्वभौमिकता अपने पूरे विस्तार और अर्जित संपदा पर अपना अधिकार जताती है, तब चित्त के तमाम काम में से जो भाग किसी व्यक्ति की गतिविधि के हिस्से आता है, वह सिर्फ छोटा ही हो सकता है। इसलिए, विज्ञान की प्रकृति की जैसी माँग है, उसके अनुसार व्यक्ति को अपने अहम को भूलना चाहिए। बेशक, उसे अपने काबिलियत के मुताबिक बनना और करना चाहिए; लेकिन उससे उम्मीद भी उतनी ही कम की जानी चाहिए, और बदले में वह खुद से भी कम उम्मीद रखे और और अपने लिए [अपने योगदान का] श्रेय भी कम माँगे।
चित्त = mind, and spirit as a universal mind. जर्मन शीर्षक Phänomenologie des Geistes का 1910 में अंग्रेजी में बैली नें Phenomenology of Mind के रूप में अनुवाद किया था, और फिर 1950 में मिलर ने इसका Phenomenology of Spirit के रूप में अनुवाद किया। इसलिए इस पुस्तक के संदर्भ में चित्त को सार्वभौमिक सोच के रूप में देखा जाना चाहिए। यह हिंदी अनुवाद बैली के 1910 के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित है। हालाँकि, हमने मिलर (1961), इनवुड (2018) और पिंकर्ड (2018) के अंग्रेज़ी अनुवादों का भी संदर्भ लिया है। जर्मन मूल का परामर्श नहीं किया गया है। ↩︎
परिघटनाशास्त्र = Phenomenology. ↩︎
आर. श्रीवत्सन अन्वेषी रिसर्च सेंटर फॉर विमेन्स स्टडीज़, हैदराबाद में वरिष्ठ फेलो रह चुके हैं। वह विकास, स्वास्थ्य, धर्म और संस्कृति पर काम करते हैं। वे दार्शनिक और राजनीतिक सिद्धांतकार हैं। ईमेल: r.srivats@gmail.com ↩︎
अदिति मुखर्जी उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद में भाषाविज्ञान की प्रोफेसर रही हैं और राष्ट्रीय अनुवाद मिशन की निदेशक भी रह चुकी हैं। फिलहाल IIIT हैदराबाद में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। ईमेल: mukherjee.aditi@yahoo.com ↩︎
कई जगह अनुवादकों ने स्पष्टता के लिए निम्नलिखित पद्धतियों का इस्तेमाल किया है: क) वाक्य के कुछ अंशों को कोष्ठक/ब्रैकेट ( ) में रखना; ख) मूल पाठ के कुछ अंशों की व्याख्या को वर्ग कोष्ठक [ ] में रखना; ग) लंबे वाक्यों को तोड़कर छोटे-छोटे वाक्य बनाना। ↩︎
Actuality = यथार्थता। हेगेल के लेख में, यथार्थता अपनी अनिवार्यता के संदर्भ में स्थिर होती है, न कि केवल "वास्तविकता," जिसमें आकस्मिक और क्षणभंगुर तत्व हो सकते हैं। “Reality” शब्द का अनुवाद “वास्तविकता” शब्द से किया गया है। ↩︎
अमध्यस्थता = "immediate" का अनुवाद “अमध्यस्थ” शब्द से करेंगे। यहाँ अमध्यस्थ का अर्थ कालिक या स्थानिक तत्कालिता नहीं है; बल्कि प्रत्यक्ष होने से है। ↩︎
अंतर्दृष्टि = insight [अंतर्ज्ञान = intuition] ↩︎
परम प्रत्यय = Absolute Idea; इस लेख के संदर्भ में “प्रत्यय” हेगेल के “Idea” शब्द का अनुवाद है। ↩︎
व्यक्ति/कर्ता = subject. अंग्रेज़ी शब्द "subject" के कई अर्थ हैं – पहला, व्यक्ति जो ज्ञाता है; दूसरा, किसी क्रिया का कारक है; तीसरा, वह व्यक्ति जो अधीन होता है; चौथा, वाक्य या तर्क में विधेय का कर्ता है। हेगेल के लेख में “subject” शब्द का प्रयोग इन सभी अर्थों में होते हैं। इस विविध प्रयोग का संकेत देने के लिए हमने द्विशब्द व्यक्ति/कर्ता को चुना है। ↩︎
सैद्धांतिक सार्वभौमिकता = abstract universality ↩︎
तार्किक-वैचारिक पद्धति = speculative approach ↩︎
क = क, अमूर्त अभिन्नता की अभिव्यक्ति है, जिसे अंग्रेज़ी में A = A के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।. ↩︎
सम्पूर्ण यथार्थता = absolute actuality ↩︎
जड़ सत्व = (inert substance) ↩︎
[सक्रिय] सार्वभौमिक = [active] universal, या [ठोस] सार्वभौमिक; एक निरपेक्ष या निष्क्रिय सार्वभौमिक के विपरीत।. ↩︎
अमध्यस्थता = immediacy. ↩︎
सत्वता = substantiality. ↩︎
स्पीनोज़ा के अनुसार ↩︎
लीबनिज़ के अनुसार ↩︎
शेलिंग के अनुसार ↩︎
निर्जीव सरलता = “inert simplicity”, जो इस संदर्भ में अमूर्तन है।. ↩︎
सम्मेलन = mediation, क्योंकि यह वाक्य एक उदात्तीकृत (sublated) एकीकरण को व्यक्त करता है। “मध्यस्थता”, जो आमतौर पर "mediation" के अनुवाद के रूप में प्रयुक्त होती है, यहाँ उपयुक्त नहीं होगी।. ↩︎
दोहराने की विपरीत प्रणाली = opposing duplication ↩︎
अनियत विविधता = indifferent diversity ↩︎
आत्म-पुनरुद्धारित एकत्व = self-restoring equality ↩︎
प्रारम्भिक एकत्व = original unity ↩︎
अमध्यस्थ एकत्व = immediate unity [of consciousness] ↩︎
अन्यता = otherness ↩︎
परिणत होना = becoming (maturing, ripening, consummation). ↩︎
स्वयं-में = in-itself ↩︎
स्वयं-के-लिए = for-itself ↩︎
सार = essence (here: truth, divine, the Absolute) ↩︎
मूलतत्व = substance ↩︎
अपने-आप-में-सम्पूर्ण-बनना = becoming-its-own-self ↩︎
मध्यस्थता = mediation ↩︎
परम प्रज्ञान = absolute cognition ↩︎
स्वचालित = self-moving (organic, not automatic) ↩︎
आत्म-गठन = equality-to-itself ↩︎
निरा नकारात्मकता = pure negativity ↩︎
स्वयंता = “The I”. हिंदी में पश्चिमी दर्शन के "The I" को व्यक्त करने के लिए कोई विशेष शब्द नहीं है, इसलिए स्वायत्तता के लिए एक नये शब्द (“स्वयंता”) का गठन किया गया है।. ↩︎
अमध्यस्थता = immediacy ↩︎
अमध्यस्थ = the immediate ↩︎
प्रतिवर्तन = reflection ↩︎
परिणत = sublate ↩︎
उद्देश्यपूर्ण सक्रियता = purposive activity. ↩︎
बाहरी उद्देश्यपूर्णता = external purposiveness (न्यूटनियन धारणा कि ईश्वर एक घड़ीसाज़ के समान है, जिसने संसार को बनाया है और उसे संचालित करता है।) ↩︎
ईश्वर शाश्वत है = “God is the eternal”. ↩︎
“यथार्थ” = यथार्थ माना जाता है, यह कतई हेगेल की संकल्पना नहीं है । ↩︎
सत्ता = Being. अन्य स्थानों पर “Being” का अनुवाद संदर्भ के अनुसार “होना” ‘मौजूदगी’ या ‘अस्तित्व’ किया गया है। ↩︎
वास्तविकीकरण = realization ↩︎
हमारे = हेगेल, और हेगेल के पाठक ↩︎
उदात्तीकृत = sublated ↩︎
प्रतिवर्तित = reflected ↩︎
स्व-निर्माण = self-generation ↩︎
वस्तुगत तत्व = objective element ↩︎
सम्पूर्ण अन्यत्व = absolute otherness ↩︎
आत्म-प्रज्ञान = self-cognition ↩︎
आध्यात्मिकता = spirituality, जिसमें अलौकिक या रहस्यवाद का कोई प्रबल भाव नहीं है। यहाँ आध्यात्मिकता सोचने और बनने की तात्कालिक इहलौकिक गतिविधि है. ↩︎
अमध्यस्थता = unmediatedness, immediacy (दार्शनिक अर्थ में). ↩︎
[मुकम्मल] सादगी = a simplicity (सादगी, जो प्रतिवर्तन और स्मरण के द्वारा, जटिलता से प्रारंभिक बिंदु पर लौट आया है). ↩︎
शर्तहीन = unconditioned ↩︎
विज्ञान = science, इस संदर्भ में, हेगेल के चित्त का विज्ञान. ↩︎
अन्य = the other, गैर-आत्म (the not-self) ↩︎
व्यक्ति-विशेष = particular individual. एक व्यक्ति जो समग्र का हिस्सा है। ↩︎
पहलू = moment, aspect, dimension, part. हेगेल के अनुसार, पहलू एक संतुलनकारी तत्व या आघूर्ण है जो सम्पूर्ण का एक हिस्सा है। ↩︎
मौजूद-होना = being-there. ↩︎
गुणस्वभाव = property, characteristic ↩︎
गैर-आंतरिक = inorganic, अर्थात, व्यक्ति की संरचना के लिए आंतरिक या जैविक नहीं। ↩︎
बूझ = comprehend, समग्र रूप से, अधिक गहराई से समझना. ↩︎
स्वयं-के-लिए-होना = being-for-itself. ↩︎
उदात्तीकरण = sublation ↩︎
(इटैलिक में) रूप = (when italicized) form. यदि शब्द को हिन्दी में इटैलिक में नहीं लिखा जाता है, तो इसका तात्पर्य रूप, आकार, छवि, प्रयोग की विधा आदि से है, जैसा कि आमतौर पर अनौपचारिक भाषा में प्रयोग किया जाता है।. ↩︎
आभास = representation, या अमध्यस्थ "चित्रात्मक चिंतन"। (यह हेगेलियन अवधारणा है।) ↩︎
आत्म = Self ↩︎
मौजूद = that-is-there ↩︎
प्रतिरूप = representation; अन्य संदर्भों में “आभास” के रूप में भी अनुवाद किया गया है। Representation: विचार में एक मौजूदगी या यथार्थता का स्वयं-में-होना है. अर्थात्, विचारों का एक समूह, जो पूरी तरह से संकल्पित नहीं है, जो विचार में किसी वस्तु-विशेष की अभिव्यक्ति है। ↩︎
उदात्तीकरण = sublation. ↩︎
नकार = the Negative, negation; नकारात्मकता = negativity ↩︎
मैं = the I – व्यक्तिपरकता का सक्रिय रूप। निरा मैं = the pure I. ↩︎
मूल = इस संदर्भ में, ‘मूल’ 'abstract' का अनुवाद है। इस वाक्य में हेगेल ने ‘abstract’ शब्द का उपयोग एक ऐसी स्वाभाविक स्थिति के लिए किया है, जिसमें कोई संशोधन या मध्यस्थता नहीं है। असल में इस वाक्य में ‘abstract’ का विशिष्ट अर्थ “मौजूदगी के सार-ग्रहण की प्रक्रिया” के विपरीत है। ↩︎
है (in italics)= is, exists. ↩︎
अमूर्त रूप = abstract form ↩︎
अधिकतर अंदरूनी अर्थ की अचिंतित पकड़ = "the unthought grasp of an internal meaning". यह वाक्य "unmediated eruption of the interior" का एक अधूरा अनुवाद है, क्योंकि इसे शब्द दर शब्द अनुवाद करने पर इसका अर्थ स्पष्ट नहीं होगा। ↩︎
महज़ = abstract, यहाँ “सिर्फ” के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। ↩︎
चित्तीय सारत्व = spiritual essentialities. "चित्त" का अनुवाद आमतौर पर "mind" किया जाता है, और "आध्यात्मिक" को "spiritual", लेकिन पारंपरिक रूप से "आध्यात्मिक" शब्द में दिव्यता (ईश्वरीयता) की भावना जुड़ी होती है। हेगेल के इस संदर्भ में इसका अर्थ यह नहीं है। यहाँ इसका संबंध विचार (thought) से है, इसलिए "चित्तीय" शब्द प्रयोग किया गया है। यह निर्णय Baillie (1910) के प्रारंभिक अंग्रेज़ी अनुवाद (Phänomenologie des Geistes को Phenomenology of Mind के रूप में अनुवादित करने) को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। ↩︎
वस्तुपरकता = objectivity ↩︎
ख़ुद-नुमा = “selfish”, स्वयं जैसा, या आत्म जैसा गुण ↩︎
तार्किक-वैचारिक= speculative (हेगेल के दर्शन के संदर्भ में). ↩︎
आभास/प्रतीति = appearance. हेगेल के फलसफे में "appearance" शब्द के कई गहरे और जटिल अर्थ हैं। एक ओर, यह केवल बाहरी रूप को दर्शाता है, जो ग़लत हो सकता है और गहराई या सार (essence) के विपरीत होता है जिसे सच्चा माना जाता है। दूसरी ओर, यह प्रकटन (phenomenon) भी है, जो चेतना के अनुभव के विज्ञान में चित्त (spirit) के विकसन का आधार बनता है। ↩︎
सामान्य विचार = representations. आम तौर पर दिए गए तर्क। ↩︎
अन्य = the Other (उसी या आत्म के विपरीत) ↩︎
दृढ़ोक्ति = Dogmatism. ↩︎
प्रस्तुत मुद्दा = the present issue, इस संदर्भ में हेगेल ने इस अर्थ में "Thing" का प्रयोग किया है। ↩︎
दूसरे-के-लिए-होना = being for another ↩︎
स्थानिक-विस्तार = space – दर्शनशास्त्र में, यह बाहरी आयाम है जिसमें हम वस्तुओं को अपने इंद्रियों से अनुभव करते हैं। इसका कोई एक शब्द हिंदी में नहीं है। ↩︎
पहलुओं: यहाँ अंग्रेजी शब्द “moment” का अनुवाद “पहलू” किया गया है, लेकिन तकनीकी रूप से इसका सही अनुवाद “आघूर्ण” होगा, जैसे जड़त्व आघूर्ण या किसी प्रणाली में संतुलन बनाने वाली शक्ति। ↩︎
बक्खनाली = Bacchanalian या उन्मादपूर्ण। ↩︎
यहाँ “भी” शब्द का प्रयोग इस तर्क की पिछले पैराग्राफ (49) से निरंतरता को दर्शाता है जहाँ हेगेल कहते हैं कि न तो विज्ञान के बारे में बातचीत, न ही विज्ञान के कठोर रवैय्या और न ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अस्वीकृति को दर्शन में कोई स्थान दिया जाना चाहिए. ↩︎
तत्वमीमांसा = metaphysics ↩︎
अभिवेदन = representation. ↩︎
व्याख्या = construction, interpreted with Inwood’s footnote as construing, interpreting – leading to theorizing (according to the context here). ↩︎
क्षीण = asthenic; तीव्र = sthenic; परोक्षतः क्षीण = indirectly asthenic. Old medical terms ↩︎
उत्कृष्टता = excellence. यहां “उत्कृष्टता” का इस्तेमाल उत्कृष्टता प्राप्त करने की प्रवृत्ति को बताने के लिए किया गया है। ↩︎
उद्धरण चिह्नों में 'सत्य-प्रत्यय' (Idea) शब्द का प्रयोग हेगेल द्वारा अपने समकालीन रोमांटिकों के उपदेशात्मक विचारों की आलोचना को दर्शाने के लिए किया गया है। यह सत्य-प्रत्यय शब्द से अलग है जिसका प्रयोग हमने हेगेल के The Idea को अनुवाद करने के लिए किया है। ↩︎
हेगेल यहाँ उपदेशात्मक शब्द का प्रयोग व्यंग्यात्मक ढंग से कर रहे हैं, जिससे उनका आशय रोमांटिकों की उस आदत से है जिस से साधारण विचारों को भी ‘प्रेरणादायक’ या ‘धार्मिक उत्थानकारी’ लातिनी शब्दों से सजाकर ऊँचा दिखाया जाता है। ↩︎
विचारात्मक = speculative वह सोच जो वास्तविकता की आत्म-गति और विपरीतों की एकता को पकड़ती है। ↩︎
निर्भर = dependent, contingent. ↩︎
पहला इस पैराग्राफ में, और दूसरा अगले पैराग्राफ में। ↩︎
आत्म = here, Self, (in the English text). ↩︎
प्रतिनिधिक, प्रतिनिधि या प्रतिनिधित्व = representative, representing; here used in the philosophical context of one entity standing for another, rather than a political one where one person stands in for what he or she represents. ↩︎
प्रतिपाद्य विषय = object, as the ontological entity that is posited as the subject of the proposition. ↩︎
सार्वभौम = The universal as as a noun; opposed to universal (सार्वभौमिक) as an adjectival form. ↩︎
लय = rhythm ↩︎
छंद = metre ↩︎
लहज़ा = accent. यहाँ लहजे का अर्थ है लहकारी लहज़ा, यानी कि संरचनात्मक (structural); व्यक्तिपरक (personal or emotional) नहीं। ↩︎
विचारात्मक= the speculative (noun form) ↩︎
स्वतः क्रमिक प्रवाह = procession (in the sense in which Hegel is using it here) ↩︎
द्रव्य-रूप = underlying, in the form of a substrate. ↩︎
सीधे ही = immediately not as in time, nor as in Hegel’s normal usage as logically unmediated, but rather directly. ↩︎
नाम मात्र = यहाँ ‘नाम’ का व्यवहार व्यक्तिवाचक संज्ञा के समान है, अर्थात् वह केवल निर्दिष्ट करता है, अवधारणा प्रस्तुत नहीं करता। ↩︎
काव्य = हेगेल यहाँ रोमांटिक कवियों का जिक्र कर रहे हैं। ↩︎
परमानंद = ecstasy. परमानन्द, हेगेल के दृष्टिकोण से समझ (कांट के अनुसार) के परिधि के बाहर की सोच के विस्तार के बारे में गलतफहमी है। ↩︎
सुसंस्कृत: यहाँ हेगेल इसे व्यंग्यात्मक रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं. ↩︎